Wednesday, January 20, 2010

विजय

कह रहा मनुष्य है जीत गया काल से
और हल तलाश लिए उसने हर सवाल के
दे रहा है तर्क नए और नए साक्ष्य भी
कल्पना भी है नई और नए लक्ष्य भी
किन्तु मेरा मत है ये वो सभी असत्य हैं
जीत सकें हैं न हम हार से ही पस्त हैं
मृत्यु पर विजय मिले तो महान जीत है
प्रेम पुष्प हों खिले तो महान जीत है
सत्य की जले मशाल तो महान जीत है
गर्व से ताने हो भाल तो महान जीत है
ज्ञान की अलख जगे तो महान जीत है
खेत हों हरे भरे तो महान जीत है
क्रोध द्वेष को तजे तो महान जीत है
भूमि का कण कण सजे तो महान जीत है
भूख प्यास न रहे तो महान जीत है
विश्व में अमन रहे तो महान जीत है ...
इसलिए ये मान लो हम अभी जीते नहीं
काल के विकराल छड शेष हैं बीते नहीं
आओ आज ले शपथ मिल के हम विकास का
त्याग तिमिर का करें लक्ष्य हो प्रकाश का
आ रहा है युग नया हम सभी स्वागत करें
शांति के लिए जियें शांति के लिए मरें ............


२० /०१/२०१०/

Wednesday, January 6, 2010

आदमी

जन्म से मृत्यु तक

टूटता रहा

भाग्य कैसे उसे

लूटता रहा

कैसे नियति ने पग पग

पछाड़ा उसे

उसके दुर्भाग्य ने कैसे

मारा उसे

कैसे पीडाएं पि कर वह

दुःख सह गया

संकरी राहों से बन कर नदी

बह गया

जब सुना उसके मुख से

तो ऐसा लगा

जैसे अनजाने ही वो

कोई कविता कह गया ।

०६/०१ /२०१०

नारी

........जीवन में मेरे सबसे निकट वो ही थी ....उसके स्नेह से मै स्नेहिल हो जाता ....उसके दुःख से दुखी ...उसका उत्साह ,आत्मविश्वास  जीवन के प्रति एक नई दृष्टि देता मुझे ...उसके पास हर समस्या का समाधान था ...या शायद उसके पास कोई समस्या थी ही नहीं ..."पाप क्या होता है "...एक बार उसने पूछा था ..क्या उसके मन के  आभामय संसार में कोई  अन्धकार शेष था ....कोई आत्मग्लानि ....कोई पराजित वेदना .......एक दिन ...स्ययम के हाथों स्ययम  को निवृति दे दी उसने .....अब वो नहीं है ..कहीं नहीं है ...है तो बस उसके द्वारा अर्जित पुरुस्कारों , ट्राफियों का संग्रह ....प्रशस्ति-पत्र ....और उसके कमरे में पसरी मनहूसियत ....आज सोचता हूँ ....'पाप क्या होता है "उसके इस अबोध प्रश्न में  कुछ था ....बहुत कुछ था .....काश की मै  उसकी पीड़ा को समझ पाता  ....उसे बता पाता कि उसका प्रश्न ही गलत है ...उसे पूछना चाहिए था "पुन्य क्या होता है ""....शयद उसका यह प्रश्न उसे उसके आत्मघाती निर्णय से रोक पाता ...कभी उसके निवेदन पर ही यह पंक्तिया लिखी थी .....आज जग से न सही इन पंक्तियों से उसका रिश्ता तो अटूट है ..... 

मै नारी हूँ ...

है कठिन धेर्य मेरा गहना
दुःख पीड़ा मुझको है सहना
निज हाथों स्व अस्तित्व मिटा
आधीन दूसरों के रहना

मै सदा स्यंम से हारी हूँ
मै नारी हूँ .........

थी बेटी तब भी छल पाया
पत्नि  बन कर मन भर आया
बन मां छाती पर बोझ सहा
दुःख ने नैनों को छलकाया

है सत्य यही दुखियारी हूँ
मै नारी हूँ ......

मेरी पीडाएं मूक रही
सब विषमताएं चुप चाप सही
दावानल अपने मन में भर
मैं शांत नदी बन कर बही

मैं धेर्य धर्म व्रत धारी हूँ
मैं नारी हूँ ......

मैंने ही  नर को जन्म दिया
पर नर ने अत्याचार किया
दे कर विश्वास का विष हाला
मेरा सब मुझसे छीन लिया

मैं सदा रही उपकारी हूँ
मैं नारी हूँ ......

मैं मात्र पूंछती हूँ इतना
मुझको क्यूँ कहा गया अबला
है यदि पुरुष में पौरुष तो
दुःख सह मुझसा दे वह दिखला

या माने मैं बलशाली हूँ
मै नारी हूँ ...............

०६ /०१ /२०१०