जन्म से मृत्यु तक
टूटता रहा
भाग्य कैसे उसे
लूटता रहा
कैसे नियति ने पग पग
पछाड़ा उसे
उसके दुर्भाग्य ने कैसे
मारा उसे
कैसे पीडाएं पि कर वह
दुःख सह गया
संकरी राहों से बन कर नदी
बह गया
जब सुना उसके मुख से
तो ऐसा लगा
जैसे अनजाने ही वो
कोई कविता कह गया ।
०६/०१ /२०१०
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