........जीवन में मेरे सबसे निकट वो ही थी ....उसके स्नेह से मै स्नेहिल हो जाता ....उसके दुःख से दुखी ...उसका उत्साह ,आत्मविश्वास जीवन के प्रति एक नई दृष्टि देता मुझे ...उसके पास हर समस्या का समाधान था ...या शायद उसके पास कोई समस्या थी ही नहीं ..."पाप क्या होता है "...एक बार उसने पूछा था ..क्या उसके मन के आभामय संसार में कोई अन्धकार शेष था ....कोई आत्मग्लानि ....कोई पराजित वेदना .......एक दिन ...स्ययम के हाथों स्ययम को निवृति दे दी उसने .....अब वो नहीं है ..कहीं नहीं है ...है तो बस उसके द्वारा अर्जित पुरुस्कारों , ट्राफियों का संग्रह ....प्रशस्ति-पत्र ....और उसके कमरे में पसरी मनहूसियत ....आज सोचता हूँ ....'पाप क्या होता है "उसके इस अबोध प्रश्न में कुछ था ....बहुत कुछ था .....काश की मै उसकी पीड़ा को समझ पाता ....उसे बता पाता कि उसका प्रश्न ही गलत है ...उसे पूछना चाहिए था "पुन्य क्या होता है ""....शयद उसका यह प्रश्न उसे उसके आत्मघाती निर्णय से रोक पाता ...कभी उसके निवेदन पर ही यह पंक्तिया लिखी थी .....आज जग से न सही इन पंक्तियों से उसका रिश्ता तो अटूट है .....
मै नारी हूँ ...
है कठिन धेर्य मेरा गहना
दुःख पीड़ा मुझको है सहना
निज हाथों स्व अस्तित्व मिटा
आधीन दूसरों के रहना
मै सदा स्यंम से हारी हूँ
मै नारी हूँ .........
थी बेटी तब भी छल पाया
पत्नि बन कर मन भर आया
बन मां छाती पर बोझ सहा
दुःख ने नैनों को छलकाया
है सत्य यही दुखियारी हूँ
मै नारी हूँ ......
मेरी पीडाएं मूक रही
सब विषमताएं चुप चाप सही
दावानल अपने मन में भर
मैं शांत नदी बन कर बही
मैं धेर्य धर्म व्रत धारी हूँ
मैं नारी हूँ ......
मैंने ही नर को जन्म दिया
पर नर ने अत्याचार किया
दे कर विश्वास का विष हाला
मेरा सब मुझसे छीन लिया
मैं सदा रही उपकारी हूँ
मैं नारी हूँ ......
मैं मात्र पूंछती हूँ इतना
मुझको क्यूँ कहा गया अबला
है यदि पुरुष में पौरुष तो
दुःख सह मुझसा दे वह दिखला
या माने मैं बलशाली हूँ
मै नारी हूँ ...............
०६ /०१ /२०१०
मै नारी हूँ ...
है कठिन धेर्य मेरा गहना
दुःख पीड़ा मुझको है सहना
निज हाथों स्व अस्तित्व मिटा
आधीन दूसरों के रहना
मै सदा स्यंम से हारी हूँ
मै नारी हूँ .........
थी बेटी तब भी छल पाया
पत्नि बन कर मन भर आया
बन मां छाती पर बोझ सहा
दुःख ने नैनों को छलकाया
है सत्य यही दुखियारी हूँ
मै नारी हूँ ......
मेरी पीडाएं मूक रही
सब विषमताएं चुप चाप सही
दावानल अपने मन में भर
मैं शांत नदी बन कर बही
मैं धेर्य धर्म व्रत धारी हूँ
मैं नारी हूँ ......
मैंने ही नर को जन्म दिया
पर नर ने अत्याचार किया
दे कर विश्वास का विष हाला
मेरा सब मुझसे छीन लिया
मैं सदा रही उपकारी हूँ
मैं नारी हूँ ......
मैं मात्र पूंछती हूँ इतना
मुझको क्यूँ कहा गया अबला
है यदि पुरुष में पौरुष तो
दुःख सह मुझसा दे वह दिखला
या माने मैं बलशाली हूँ
मै नारी हूँ ...............
०६ /०१ /२०१०
realy a good one pls do write more n more... all the best...Rgds
ReplyDeletebhut achha likhate hai.
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