आदरणीय नवल जी .....सविनय धन्यवाद सहित ....आभार आपके द्वारा की गई समीक्षा इतनी सटीक ,सार्थक होती है कि ....खुद की ही रचना को पुनः पढने ....पुनः गढ़ने की छह हो उठती है ...निश्चित ही इस रचना में वो कमियां रह गई जो परस्पर पंक्तियों को आबद्ध कर स्ययम को
Saturday, September 8, 2012
Friday, September 7, 2012
"पिछले कुछ दिनों से ख़याल आ रहे थे मगर एक मुकाम तक पहुँचने से दूर थे ......कल रात ख़याल मुकम्मल हो सके .......इस मंच के सभी वरिष्ठ एवं सम्मानित मित्रों से प्रशंसा /आलोचना रुपी आशीर्वाद चाहूँगा .........."
....................बस यूँ ही ....................
तुझको भुलाना चाहा ,खुद को भुला दिया
मुझको मेरी वफाओं ने कैसा सिला दिया
हम तो चले थे ढूडने हम जैसा आदमी
राहों की ठोकरों ने खुदा से मिला दिया
साक़ी की बेरुखी का ये अंदाज देखिये
पीना था हमें और क्या उसने पिला दिया
अपने लहू से हमने चमन को बहार दी
शाखों की साजिशों ने गुलो को जला दिया
अखबार की कतरन में भूख से हुई मौतें
दिल्ली न सही ,दिल को ख़बर ने हिला दिया
जैसी भी रही खूब रही तेरा शुक्रिया
हर रंग-ओ-बू से याखुदा तूने मिला दिया
तुझको भुलाना चाहा खुद को भुला दिया ................सविनय ....
....................बस यूँ ही ....................
तुझको भुलाना चाहा ,खुद को भुला दिया
मुझको मेरी वफाओं ने कैसा सिला दिया
हम तो चले थे ढूडने हम जैसा आदमी
राहों की ठोकरों ने खुदा से मिला दिया
साक़ी की बेरुखी का ये अंदाज देखिये
पीना था हमें और क्या उसने पिला दिया
अपने लहू से हमने चमन को बहार दी
शाखों की साजिशों ने गुलो को जला दिया
अखबार की कतरन में भूख से हुई मौतें
दिल्ली न सही ,दिल को ख़बर ने हिला दिया
जैसी भी रही खूब रही तेरा शुक्रिया
हर रंग-ओ-बू से याखुदा तूने मिला दिया
तुझको भुलाना चाहा खुद को भुला दिया ................सविनय ....
Tuesday, September 4, 2012
उनवान ***ईश्वर/भगवान/परमात्मा/ईश/ प्रभु/परमेश्वर/परमेश/मालिक/ खुदा/अल्लाह/खुदाबंद/रब*** पर रचना..
जीवन के आपातकाल में ..जब हारने के लिए कुछ नहीं बचा था ..और जीतने लिए कोई उम्मीद नहीं ...तब अंतर्मन से कुछ आवाजें आती थी ...वो कौन था ...मेरा अंतर्मन या कोई और ....'क्या परमात्मा "....हाँ शायद ............
आ निराशा घेर मुझको ,भेद दे मेरा ह्रदय
अंश मन में शेष है ,आशा का दे उसको मिटा
प्राण तन में न रहे, दे इस तरह मुझको हिला
स्वप्न सरे तोड़ कर नैनों में काटें दे चुभो
छोड़ दे मुझको तिमिर में, सूर्य दे मेरा डुबो
मन में है जो द्वन्द ,उसमे मच रहा कैसा प्रलय
आ निराशा घेर मुझको ,भेद दे मेरा ह्रदय .....
जीवन के आपातकाल में ..जब हारने के लिए कुछ नहीं बचा था ..और जीतने लिए कोई उम्मीद नहीं ...तब अंतर्मन से कुछ आवाजें आती थी ...वो कौन था ...मेरा अंतर्मन या कोई और ....'क्या परमात्मा "....हाँ शायद ............
आ निराशा घेर मुझको ,भेद दे मेरा ह्रदय
अंश मन में शेष है ,आशा का दे उसको मिटा
प्राण तन में न रहे, दे इस तरह मुझको हिला
स्वप्न सरे तोड़ कर नैनों में काटें दे चुभो
छोड़ दे मुझको तिमिर में, सूर्य दे मेरा डुबो
मन में है जो द्वन्द ,उसमे मच रहा कैसा प्रलय
आ निराशा घेर मुझको ,भेद दे मेरा ह्रदय .....
कौन है जो श्वास में विश्वास को है सींचता
कौन है जो काल की बांहों से मुझको खीचता
कौन है जो दूर ही से रौशनी दिखला रहा
कौन है जो उच्च स्वर में गीत जय के गा रहा
कौन कहता है लड़ो संघर्ष से होती विजय
कौन कहता है लड़ो संघर्ष से होती विजय
आ निराशा घेर मुझको भेद दे मेरा ह्रदय .....
कौन कहता है निराशा ,हार का प्रारंभ है
मात्र आशावादियों का यह अनर्गल दंभ है
सत्य यह है निराशा से ही मुक्ति पथ मिले
सृष्टि -सृष्टा के अवर्णित रूप की आहट मिले
इसलिये ही ओ निराशा ,आज मै करता तेरी जय
आ निराशा घेर मुझको ,भेद दे मेरा ह्रदय ............//
कौन कहता है निराशा ,हार का प्रारंभ है
मात्र आशावादियों का यह अनर्गल दंभ है
सत्य यह है निराशा से ही मुक्ति पथ मिले
सृष्टि -सृष्टा के अवर्णित रूप की आहट मिले
इसलिये ही ओ निराशा ,आज मै करता तेरी जय
आ निराशा घेर मुझको ,भेद दे मेरा ह्रदय ............//
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