Tuesday, September 4, 2012

उनवान ***ईश्वर/भगवान/परमात्मा/ईश/प्रभु/परमेश्वर/परमेश/मालिक/खुदा/अल्लाह/खुदाबंद/रब*** पर रचना..

जीवन के आपातकाल में ..जब हारने के लिए कुछ नहीं बचा था ..और जीतने लिए कोई उम्मीद नहीं ...तब अंतर्मन से कुछ आवाजें आती थी ...वो कौन था ...मेरा अंतर्मन या कोई और ....'क्या परमात्मा "....हाँ शायद ............
आ निराशा घेर मुझको ,भेद दे मेरा ह्रदय

अंश मन में शेष है ,आशा का दे उसको मिटा
प्राण तन में न रहे, दे इस तरह मुझको हिला
स्वप्न सरे तोड़ कर नैनों में काटें दे चुभो
छोड़ दे मुझको तिमिर में, सूर्य दे मेरा डुबो

मन में है जो द्वन्द ,उसमे मच रहा कैसा प्रलय
आ निराशा घेर मुझको ,भेद दे मेरा ह्रदय .....

        कौन  है जो श्वास में विश्वास को है सींचता
        कौन है जो काल की बांहों से मुझको खीचता
        कौन है जो दूर ही से रौशनी  दिखला रहा
        कौन है जो उच्च स्वर में गीत जय के गा रहा

 कौन कहता है लड़ो संघर्ष से होती विजय
आ निराशा घेर मुझको भेद  दे मेरा ह्रदय .....

कौन कहता है निराशा ,हार का प्रारंभ है
मात्र आशावादियों का यह अनर्गल दंभ है
सत्य यह है निराशा से ही मुक्ति पथ मिले
सृष्टि -सृष्टा के अवर्णित रूप की आहट मिले

इसलिये ही ओ निराशा ,आज मै  करता तेरी जय
आ निराशा घेर मुझको ,भेद दे मेरा ह्रदय ............//

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