Friday, September 7, 2012

"पिछले कुछ दिनों से ख़याल आ रहे थे मगर एक  मुकाम तक पहुँचने से दूर थे ......कल रात ख़याल मुकम्मल हो सके .......इस मंच के सभी वरिष्ठ एवं  सम्मानित मित्रों से प्रशंसा /आलोचना रुपी आशीर्वाद चाहूँगा .........."

....................बस यूँ ही ....................

तुझको भुलाना चाहा ,खुद को भुला दिया
मुझको मेरी वफाओं ने कैसा सिला दिया

हम तो चले थे ढूडने हम जैसा आदमी
राहों की ठोकरों ने खुदा से मिला दिया

साक़ी की बेरुखी का ये अंदाज देखिये
पीना था हमें और क्या उसने पिला दिया

अपने लहू से हमने चमन को बहार दी
शाखों की साजिशों ने गुलो को जला दिया

अखबार की कतरन में भूख से हुई मौतें
दिल्ली न सही ,दिल को ख़बर ने हिला दिया

जैसी भी रही खूब रही तेरा शुक्रिया
हर रंग-ओ-बू से याखुदा तूने  मिला दिया

तुझको भुलाना चाहा  खुद को भुला दिया  ................सविनय ....

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