Saturday, May 28, 2011

gazal

दर्द को आवाज़ दी तो साज़ पे आई ग़ज़ल
दर्द मीठा हो गया कुछ इस तरह छाई ग़ज़ल
तोहमतें,रुसवाइया,इलज़ाम कितने हों  मिले
प्यार का जब जिक्र आया फिर से लहराई ग़ज़ल
उसने देखा था मेरे हर एक ख़त को बार-बार
याद आते ही वो लम्हे कई बार  मुस्काई   ग़ज़ल
माँ ने गिरने पर मेरे माथे को चूमा था कभी
माँ के अहसासों की नरमी आँख भर आई ग़ज़ल
अब सियासतदार भी करने लगे है शायरी
बस इसी एक सोच में है खुद से शरमाई ग़ज़ल

दर्द को आवाज़ दी तो साज़ पे आई ग़ज़ल .............................


Wednesday, May 18, 2011

मैंने कभी नहीं चाहा
...स्पर्श करूँ
मौन अधरों को तुम्हारे
चूम लू / आभा युक्त ललाट को
...या की तुम्हारी गति के साथ /लयबद्ध
तुम्हारे वाचाल वक्षो को ...
मैंने यह भी नहीं चाहा /एकांत में
तुम्हारे बालों की घनी छाया में
शांत करू मन की व्याकुलता
...तुम्हारी उँगलियों को छेड़
झंकृत कर दूँ /मन के भीतर
एक कोने में सुरक्षित रखी
वीणा के तारों को
......किन्तु...........
हमारे बीच
सदैव ही रहा
हमारे शरीरों का व्याकरण
अंगो के शब्दकोष
और उनमे से
झरता रहा /एक वाक्य
की हम रहेंगे सदैव ही
अपरिचित ....
संवेदना के धरातल पर ...................
                                                               २९/०५/2010
सदियों पहले मेरी ग़ज़ल को उसने चूमा था
उसकी आँखों में अभी तक है मोहब्बत का नशा .....
दिल तेरा जब आइना हो जायेगा
देखना तू क्या से क्या हो जायेगा
खेत में जब लहलहा झूमी फसल
मन धरा का भी गया थोडा मचल

जोश में आ कर कृषक ने तान छेड़ी
जोर से हंस दी वधु वह नव नवेली

त्याग कर संकोच भय की भंगिमाए
ग्राम बालाओ ने झट घुघंट हटाये

बैल भी उन्मुक्त हो कर मुस्कुराये
पक्षियों ने नव स्वरों में गीत गाये

बूढ़े बरगद से उतर शीतल हवा ने
भागते तेजी से बादल की छटा ने

टूटे खपरैलो की निर्धन झोपड़ी ने
गाय के नवजात शिशु की चौकड़ी ने

बिन कहे मुझसे बहुत कुछ कह दिया
और मैंने क्षण में एक जीवन जिया .........
                                                                       ०१/०४/2000

Tuesday, May 17, 2011

तुम स्वप्न बन आओ प्रिये ....

चेतन में है पीड़ा भरी
हर चोट मन की है हरी
हूँ लस्त-पस्त परास्त हूँ
है कल्पनाये डरी-डरी

कुछ क्षण सुखद लाओ प्रिये
तुम स्वप्न बन आओ प्रिये

हूँ मै अबोध डरा -डरा
मन मै है दुःख का विष भरा
सिर पर है नभ की क्रूरता
पांव में है तपती धरा

बन मेघ जल बरसो प्रिये
तुम स्वप्न बन आओ प्रिये 

विश्वास मेरा खो चुका 
जो था मेरा मै खो चुका 
हूँ विवस जीने के लिए 
है गहन तिमिर मै जंहा रुका 

अब दूर न जाओ प्रिये 
तुम स्वप्न बन आओ प्रिये
                                            १७/०५/11 

prem

है कौन स्वप्न बन कर आता
आहत मन को सहलाता
है कौन ................................

एकांत रात्रि में निशदिन
अपने यौवन का भार लिए
जो स्यम काम को मुग्ध करे
निज तन पर वह श्रृगार लिए

है मंद-मंद आ मुस्काता
है कौन स्वप्न बन कर आता ......

उसके अधरों की चंचलता
रह मूक बहुत कुछ कह जाती
अपने आलौकित नैनों से
आ चिर प्रकाश वह बरसाती

पा उसको जीवन तर जाता
है कौन स्वप्न बन कर आता ....

उसका स्पर्श भी अदभुत है
निर्जीव देह को प्राण मिले
छड भर समीप वह आ बैठे
तो जीवन को पहचान मिले

कैसा अदभुत है वह नाता
है कौन स्वप्न बन कर आता ........
                                                                १७/०५/11