दर्द को आवाज़ दी तो साज़ पे आई ग़ज़ल
दर्द मीठा हो गया कुछ इस तरह छाई ग़ज़ल
तोहमतें,रुसवाइया,इलज़ाम कितने हों मिले
प्यार का जब जिक्र आया फिर से लहराई ग़ज़ल
उसने देखा था मेरे हर एक ख़त को बार-बार
याद आते ही वो लम्हे कई बार मुस्काई ग़ज़ल
माँ ने गिरने पर मेरे माथे को चूमा था कभी
माँ के अहसासों की नरमी आँख भर आई ग़ज़ल
अब सियासतदार भी करने लगे है शायरी
बस इसी एक सोच में है खुद से शरमाई ग़ज़ल
दर्द को आवाज़ दी तो साज़ पे आई ग़ज़ल .............................