Wednesday, May 18, 2011

खेत में जब लहलहा झूमी फसल
मन धरा का भी गया थोडा मचल

जोश में आ कर कृषक ने तान छेड़ी
जोर से हंस दी वधु वह नव नवेली

त्याग कर संकोच भय की भंगिमाए
ग्राम बालाओ ने झट घुघंट हटाये

बैल भी उन्मुक्त हो कर मुस्कुराये
पक्षियों ने नव स्वरों में गीत गाये

बूढ़े बरगद से उतर शीतल हवा ने
भागते तेजी से बादल की छटा ने

टूटे खपरैलो की निर्धन झोपड़ी ने
गाय के नवजात शिशु की चौकड़ी ने

बिन कहे मुझसे बहुत कुछ कह दिया
और मैंने क्षण में एक जीवन जिया .........
                                                                       ०१/०४/2000

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