मैंने कभी नहीं चाहा
...स्पर्श करूँ
मौन अधरों को तुम्हारे
चूम लू / आभा युक्त ललाट को
...या की तुम्हारी गति के साथ /लयबद्ध
तुम्हारे वाचाल वक्षो को ...
मैंने यह भी नहीं चाहा /एकांत में
तुम्हारे बालों की घनी छाया में
शांत करू मन की व्याकुलता
...तुम्हारी उँगलियों को छेड़
झंकृत कर दूँ /मन के भीतर
एक कोने में सुरक्षित रखी
वीणा के तारों को
......किन्तु...........
हमारे बीच
सदैव ही रहा
हमारे शरीरों का व्याकरण
अंगो के शब्दकोष
और उनमे से
झरता रहा /एक वाक्य
की हम रहेंगे सदैव ही
अपरिचित ....
संवेदना के धरातल पर ...................
२९/०५/2010
No comments:
Post a Comment