Tuesday, May 17, 2011

prem

है कौन स्वप्न बन कर आता
आहत मन को सहलाता
है कौन ................................

एकांत रात्रि में निशदिन
अपने यौवन का भार लिए
जो स्यम काम को मुग्ध करे
निज तन पर वह श्रृगार लिए

है मंद-मंद आ मुस्काता
है कौन स्वप्न बन कर आता ......

उसके अधरों की चंचलता
रह मूक बहुत कुछ कह जाती
अपने आलौकित नैनों से
आ चिर प्रकाश वह बरसाती

पा उसको जीवन तर जाता
है कौन स्वप्न बन कर आता ....

उसका स्पर्श भी अदभुत है
निर्जीव देह को प्राण मिले
छड भर समीप वह आ बैठे
तो जीवन को पहचान मिले

कैसा अदभुत है वह नाता
है कौन स्वप्न बन कर आता ........
                                                                १७/०५/11

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