Saturday, May 28, 2011

gazal

दर्द को आवाज़ दी तो साज़ पे आई ग़ज़ल
दर्द मीठा हो गया कुछ इस तरह छाई ग़ज़ल
तोहमतें,रुसवाइया,इलज़ाम कितने हों  मिले
प्यार का जब जिक्र आया फिर से लहराई ग़ज़ल
उसने देखा था मेरे हर एक ख़त को बार-बार
याद आते ही वो लम्हे कई बार  मुस्काई   ग़ज़ल
माँ ने गिरने पर मेरे माथे को चूमा था कभी
माँ के अहसासों की नरमी आँख भर आई ग़ज़ल
अब सियासतदार भी करने लगे है शायरी
बस इसी एक सोच में है खुद से शरमाई ग़ज़ल

दर्द को आवाज़ दी तो साज़ पे आई ग़ज़ल .............................


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