Saturday, January 5, 2013



आदरणीय शुक्ल जी ....प्रतीकों के साथ उपस्थिति ... भावों की प्रस्तुति का सहज किन्तु गंभीर माध्यम है  .....इसमें छोटी  सी भूल ...अर्थ का अनर्थ कर जाती है ......जैसा की आदरणीय तयाल  जी ....सिया जी  ने इंगित किया .....सादर ....

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