Saturday, January 5, 2013

"आदरणीय दिव्या जी ....आज आपने अपनी इस सुन्दर ,सारगर्भित ,मर्मस्पर्शी रचना के माध्यम से .... उस स्वर को वाणी दी जिसका आज उदघोष होना चाहिए ...स्त्री -पुरुष के के बीच सदैव ही एक विभाजित रेखा खीचने का काम किया गया ....फिर वह चाहे साहित्य चिंतन रहा हो ....समाज शास्त्रीय विश्लेषण , अथवा जन-आक्रोश ....यही वजह है की हर घटना के पश्चात् ...स्त्री अपने दायरे में सिमट जाने ,लौट जाने के लिए विवश हुई ...वहीँ पुरुष मन आहत ,अपमानित ....जबकि आवश्यकता इस बात की है कि ...स्त्री-पुरुष के बीच खिंची गई इस रेखा को पूरी तरह से मिटा कर ....परस्पर विश्वसनीय ,पारदर्शी वातावरण निर्मित किया जाए .....आपने इस सुन्दर रचनाके साथ ...गहरे भाव उकेरे ....वहीँ एक गंभीर सन्देश भी प्रेषित करने में पूर्णतः सफल रही .....सादर ".................आदरणीय नवल जी आप सोच रहे होंगे ....आपकी पोस्ट पर " दिव्या जी '' का संबोधन ......दरअसल यह प्रतिक्रिया कुछ दिनों पूर्व उनकी बहुत ही सुन्दर ....मर्मस्पर्शी रचना ...पर दी थी ...काव्य-शैली में निश्चित  ही भिन्नता है .....किन्तु स्वर और भाव दिव्या जी और आपकी इस अद्भुत रचना में ठीक एक जैसे है ......न किसी प्रकार का वैचारिक आडम्बर ....न कोई आरोप -प्रत्यारोप ...न ही किसी प्रकार के साहित्यिक घडियाली आसूं .....स्त्री -पुरुष के बीच के सत्य को ...उतनी ही सुन्दरता से उकेरती इस सुन्दर रचना के लिए .......ह्रदय से बधाई .....साथ ही धन्यवाद .....इन विषम क्षणों में इतने सुन्दर /सत्य भावों को काव्य-रूप में ढालने के लिए ........सादर ......................

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