Monday, January 7, 2013

आदरणीय निशा जी ....क्या बात है ...सुन्दर ...बहुत सुन्दर .....
"तेरे ही दुःख तड़पाते हैं  
तेरे ही सुख करते हैं सुखी".....प्रेम की पराकाष्ठ ..

 तेरे आने से महकते हम
ज्यूँ कस्तूरी महके वन में
तेरा जाना कांटे सा चुभे  
इस सूने एकाकी मन में .......मिलन के उस अद्भुत रोमांच , उस अप्रतिम उत्साह को जिस कुशलता से आपने वाणी दी ....बधाई ....बहुत बधाई ........साथ ही .विरह के क्षणों के दंश भोगते एकाकी मन के साथ पाठक  मन भी उसी गहन वेदना को महसूस करता है ...बड़ी ही सहजता से उस पीड़ा को कह दिया आपने ......जय हो ......

"तेरे -मेरे "........बीच बस एक पंक्ति का ओचित्य समझ नहीं पा रहा हूँ ..............
खिलते फूलों का रस पीने  
कोई भंवरा ना मंडराया ! ......प्रेम के मिलन और विरह के बीच ....मन एकाकी /तन एकाकी ......उस पर खिलते फूल और भंवरों के न मंडराने का बोध ....इस सुन्दर गीत की गति में बाधा है .....ऐसा मेरा वतिगत मन्ना है ....निश्चित ही "प्रेम " भाव ... अनंत संभावनाओ  से भरा भाव है ...जितना भी सुन्दर लिखा जाए ...और सुन्दर हो पाने की आशा रहती है ....मै इस सुन्दर गीत के प्रति भी वाही आशा रखता हूँ ....सादर ....

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