"एकल काव्य पाठ --- 51" - दिसंबर 01, 2012 --- "
नाम -प्रेमप्रदीप
रचना -2
प्रेम ने ही सत्य का बोध कराया ...सत्य ने व्यवहार को विनम्र, वाणी को मुखर बनाया ,....हाथों को कलम थमाई .....मन का दीप प्रदीप्त हो उठा ......."
.....................नव -जागरण .........................
ऐ कलम नव-जागरण के गीत गा .............
प्यार को मनुहार को अब त्याग दे
आह को अब इंकलाबी आग दे
शासकों के दर्प को दे कर चुनौती
शोषितों के हक में तू आवाज दे
त्याग वैभव प्रेम का ,अब आमजन के गीत गा
ऐ कलम नवजागरण के गीत गा ................
मंदिरों में रच रहे षड़यंत्र हैं
मस्जिदों में भी विदेशी-तंत्र हैं
सत्य कहना बन गया अपराध है
झूठ को ओढ़े हुए गणतंत्र है
शुद्ध मन से आज तू , शुद्धिकरण के गीत गा
ऐ कलम नव जागरण के गीत गा ................
आज दिल्ली चुप है ,राजा मौन है
भ्रम है साधू कौन ,डाकू कौन है
द्रोपदी-अभिमन्यु फिर लाचार हैं
चुप पितामह, चुप धनुर्धर,द्रोण है
है पुनः कुरुक्षेत्र ये , जीवन-मरण के गीत गा
ऐ कलम नवजागरण के गीत गा ..................
है समय उदघोष का उदघोष कर
सोई लहरों में नया आवेग भर
तन तपश्वी ,मन हवन -शाला बना
शिव का धर लें रूप सारे शब्द -स्वर
क्रांति की ज्वाला में तप , अंतःकरण के गीत गा
ऐ कलम नवजागरण के गीत गा ..................... प्रेमप्रदीप
No comments:
Post a Comment