Saturday, June 8, 2013

" जाने से पहले ....द्वार की चौखट पर खड़ी वो ...मौन...तटस्थ...किसी पाषाण प्रतिमा सी ...छलक ही उठी थी आखों से वो अश्रु-बूंदे.....मै तिरस्कार का पात्र था ...क्षमा मांगना चाहता था उससे ...उसके निश्छल प्रेम से ...लेकिन वो चली गई ...उसकी वो अश्रु-बूंदे और मेरी क्षमा याचना ...दोनों ही अव्यक्त /शापित ......"...



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 मेरे जीवन के  सूनेपन में कुछ धुंधली स्म्रतियां शेष
कुछ काटों की चुभन और कुछ पुष्पों के कोमल अवशेष

है एकांत किन्तु सन्नाटे मैं भी है  एक कोलाहल
रह रह कर क्यों याद हैं आते बीत गए वो बीते पल

क्यूँ  याद आता है उसका पथ पर मिलना फिर थम जाना
नयनो  से अभिनन्दन करना नयनो  से ही शर्माना

क्यूँ  याद आता है उसका छत पर बालों को झटकाना 
क्यों याद आता है उसका आती हूँ कह कर खो जाना

क्यों याद आता है उसका ऊँगली में आँचल को कसना
और मेरी बातो को सुन पागल कह कर खुल कर हँसना

भूल जाओ मुझको, कह कर उसका वह  रोना याद आता
और जहां मिलते थे हम वो बाग़ का कोना याद आता

यांदें ...यादें ...यादें ही अब शेष रही सुने मन में
ठहर गए इस नीरस जीवन के नीरस सूनेपन में ............।....बस यूँ ही ......

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