Thursday, January 24, 2013

अपनी नज्मों /कविताओं में गहन मौन के साथ विचरने वाले मन के प्रति ....आपके मन से निकली इस मौन प्रार्थना का असर परमात्मा पर जरुर होगा ....आदरणीय संध्या जी .....
ये   रात का घनघोर तम   छट जायेगा
नवरंग भर अम्बर पुनः मुस्कायेगा
 विकराल क्षण हैं  काल के तो क्या हुआ
 



Monday, January 7, 2013

आदरणीय निशा जी ....क्या बात है ...सुन्दर ...बहुत सुन्दर .....
"तेरे ही दुःख तड़पाते हैं  
तेरे ही सुख करते हैं सुखी".....प्रेम की पराकाष्ठ ..

 तेरे आने से महकते हम
ज्यूँ कस्तूरी महके वन में
तेरा जाना कांटे सा चुभे  
इस सूने एकाकी मन में .......मिलन के उस अद्भुत रोमांच , उस अप्रतिम उत्साह को जिस कुशलता से आपने वाणी दी ....बधाई ....बहुत बधाई ........साथ ही .विरह के क्षणों के दंश भोगते एकाकी मन के साथ पाठक  मन भी उसी गहन वेदना को महसूस करता है ...बड़ी ही सहजता से उस पीड़ा को कह दिया आपने ......जय हो ......

"तेरे -मेरे "........बीच बस एक पंक्ति का ओचित्य समझ नहीं पा रहा हूँ ..............
खिलते फूलों का रस पीने  
कोई भंवरा ना मंडराया ! ......प्रेम के मिलन और विरह के बीच ....मन एकाकी /तन एकाकी ......उस पर खिलते फूल और भंवरों के न मंडराने का बोध ....इस सुन्दर गीत की गति में बाधा है .....ऐसा मेरा वतिगत मन्ना है ....निश्चित ही "प्रेम " भाव ... अनंत संभावनाओ  से भरा भाव है ...जितना भी सुन्दर लिखा जाए ...और सुन्दर हो पाने की आशा रहती है ....मै इस सुन्दर गीत के प्रति भी वाही आशा रखता हूँ ....सादर ....

Saturday, January 5, 2013

............बस यूँ ही ..................

""कुछ  बोलना गुनाह हुआ है तो क्या करे


अब देश चारागाह हुआ है तो क्या करे

सच बोलने के जुर्म में रुसवा किये गए

हर झूठ वाह -वाह हुआ है तो क्या करे"...............

तबसे वो चौखट
रौशन है
और
हर शाम मैं
दिया बन जाता हूँ ..
मुफलिसी को क्या खूब सूफियाना अंदाज दिया आपने .....


आदरणीय शुक्ल जी ....प्रतीकों के साथ उपस्थिति ... भावों की प्रस्तुति का सहज किन्तु गंभीर माध्यम है  .....इसमें छोटी  सी भूल ...अर्थ का अनर्थ कर जाती है ......जैसा की आदरणीय तयाल  जी ....सिया जी  ने इंगित किया .....सादर ....