Saturday, June 8, 2013

bas yun hi.....

क्या ये प्रजातंत्र है,क्या ये प्रजातंत्र है

             शोर है चारों तरफ खामोशियाँ चारों तरफ
              साजिशें चारों तरफ सरगोशियाँ चारों तरफ
              मख्खियों की भिनभिनाहट ,मच्छरों के डंक है
             सत्य है सहमा हुआ हँसता हुआ आतंक है

क्या ये  प्रजातंत्र  है क्या ये प्रजातंत्र है ....................
                                                                                            ०१/०७/2011
सम्मानित मंच द्वारा दिए गए इस सुन्दर अवसर पर मै अपने मन के भावों को प्रस्तुत कर सका ....इसे रचना का मान आप सम्मानित मित्रों की सराहना से मिला ....लिखते समय कभी भी इसके गुण-दोषों पर इतने विस्तार से नहीं जा सका ....जितने विस्तार से आप सम्मानित मित्रों ने अपना स्नेह / सराहना दी। .....हम -आपको और चाहिए भी क्या ,एक रचनाकार होने के नाते ...बस यही न की हमारी रचनाओं को ..हमारे विचारों को उचित प्रतिसाद मिले ....गंभीर सराहना /आलोचना से बढ़कर  कोई और पुरूस्कार क्या होगा। ....आदरणीय ... नवल जी ,सिया जी ,अलका जी,सपन साहब,आशुतोष जी ,निशित जी ,सिन्हा साहब ,गोविन्द जी ,अतुल जी ,विनोद जी ,प्रमिला जी ,रोशन जी ,पारीक साहब,विनोद जी ,रमेश जी ,शशि सिंह जी ,संदीप जी ,वरुण जी ,शशि पुरवार जी,निशा जी, फानी जी  ........आप सभी की गंभीर उपस्थिति ने इन रचनाओ का मान बढाया है ....मै  ह्रदय से कहता हूँ ..... सम्मानित मंच द्वारा दिए गए इस सम्मान ...और आप वरिष्ठ ,सम्मानित मित्रो का ये   स्नेह मेरी स्मृतियों में स्पंदित होता रहेगा ....मुझे व्यक्तिशः  आप सम्मानित मित्रों के स्नेह को सम्मान देना चाहिए था किन्तु लक्ष्मी जी आड़े आ गई .....पेशे से सेल्स-मेन  हूँ ना ....मार्केट से लक्ष्मी बटोरुंगा ...तभी तो बॉस सुबह हँसकर  गुडमोर्निंग का जवाब देगा ...हा हां हा हा .....पुनः आप सभी वरिष्ठ ,सम्मानित मित्रो को नमन करता हूँ .....सादर .....सम्मानित मंच द्वारा दिए गए इस सुन्दर अवसर पर मै अपने मन के भावों को प्रस्तुत कर सका ....इसे रचना का मान आप सम्मानित मित्रों की सराहना से मिला ....लिखते समय कभी भी इसके गुण-दोषों पर इतने विस्तार से नहीं जा सका ....जितने विस्तार से आप सम्मानित मित्रों ने अपना स्नेह / सराहना दी। .....हम -आपको और चाहिए भी क्या ,एक रचनाकार होने के नाते ...बस यही न की हमारी रचनाओं को ..हमारे विचारों को उचित प्रतिसाद मिले ....गंभीर सराहना /आलोचना से बढ़कर  कोई और पुरूस्कार क्या होगा। ....आदरणीय ... नवल जी ,सिया जी ,अलका जी,सपन साहब,आशुतोष जी ,निशित जी ,सिन्हा साहब ,गोविन्द जी ,अतुल जी ,विनोद जी ,प्रमिला जी ,रोशन जी ,पारीक साहब,विनोद जी ,रमेश जी ,शशि सिंह जी ,संदीप जी ,वरुण जी ,शशि पुरवार जी,निशा जी, फानी जी  ........आप सभी की गंभीर उपस्थिति ने इन रचनाओ का मान बढाया है ....मै  ह्रदय से कहता हूँ ..... सम्मानित मंच द्वारा दिए गए इस सम्मान ...और आप वरिष्ठ ,सम्मानित मित्रो का ये   स्नेह मेरी स्मृतियों में स्पंदित होता रहेगा ....मुझे व्यक्तिशः  आप सम्मानित मित्रों के स्नेह को सम्मान देना चाहिए था किन्तु लक्ष्मी जी आड़े आ गई .....पेशे से सेल्स-मेन  हूँ ना ....मार्केट से लक्ष्मी बटोरुंगा ...तभी तो बॉस सुबह हँसकर  गुडमोर्निंग का जवाब देगा ...हा हां हा हा .....पुनः आप सभी वरिष्ठ ,सम्मानित मित्रो को नमन करता हूँ .....सादर .....
"सम्मानित  मंच ... वरिष्ठ एवं  सम्मानित मित्रों ...मेरी क्षणिक उपस्थिति का कारण यह नहीं कि मै व्यस्त हूँ ....कारण यह है की मै  अस्त-व्यस्त हूँ ...साधारण से मोबाईल पर सम्मानित मंच की गतिविधियों को निरंतर  पढ़ तो पाता  हूँ ...लेकिन शाब्दिक सहभागिता दे पाना उस मोबाईल से संभव नहीं ...सहभागिता के लिए मुझे नेट-कैफे पर ही जाना होता है ...इस विवशता में मंच पर प्रस्तुत बहुत सी सुन्दर /सार्थक रचनाओ ...साहित्यिक विचार-विमर्श ...गतिविधियों में पूर्ण रूप से सम्मिलित नहीं हो पाता ...ह्रदय से क्षमाप्रार्थी हूँ उन समस्त रचनाओं से ...गतिविधियों से ..आपसे ....मुझे पूर्ण विस्वास है ..मरी विवशता ,मेरे प्रति आपके  आशीर्वाद रुपी स्नेह को कभी कम नहीं कर पायेगी ....सविनय .......
 "एकल काव्य पाठ --- 51" - दिसंबर 01, 2012 --- "


  नाम -प्रेमप्रदीप 

  रचना  -2 
 
प्रेम ने ही सत्य का बोध कराया ...सत्य ने व्यवहार को विनम्र, वाणी को मुखर बनाया ,....हाथों को कलम थमाई .....मन का दीप प्रदीप्त हो उठा ......."

.....................नव -जागरण .........................

ऐ कलम नव-जागरण के गीत गा .............

प्यार को मनुहार को अब त्याग दे 
आह को अब  इंकलाबी आग दे 
शासकों के दर्प को दे कर चुनौती 
शोषितों के हक में तू आवाज दे 

त्याग वैभव प्रेम का ,अब आमजन के गीत गा 
ऐ कलम नवजागरण के गीत गा ................

मंदिरों में रच रहे षड़यंत्र हैं  
मस्जिदों में भी विदेशी-तंत्र हैं  
सत्य कहना बन गया अपराध है 
झूठ को ओढ़े हुए गणतंत्र है 

शुद्ध मन से आज तू , शुद्धिकरण के गीत गा 
ऐ कलम नव जागरण के गीत गा ................

आज दिल्ली चुप है ,राजा मौन है 
भ्रम है साधू कौन ,डाकू कौन है 
द्रोपदी-अभिमन्यु फिर लाचार हैं 
चुप पितामह, चुप धनुर्धर,द्रोण है 

है पुनः कुरुक्षेत्र  ये , जीवन-मरण के गीत गा 
ऐ कलम नवजागरण  के गीत गा ..................

है समय उदघोष  का उदघोष कर 
सोई लहरों में नया आवेग भर 
तन तपश्वी ,मन  हवन -शाला बना 
शिव का धर लें रूप सारे शब्द -स्वर 

क्रांति की ज्वाला में तप , अंतःकरण के गीत गा 
ऐ कलम नवजागरण के गीत गा .....................      प्रेमप्रदीप 

" जाने से पहले ....द्वार की चौखट पर खड़ी वो ...मौन...तटस्थ...किसी पाषाण प्रतिमा सी ...छलक ही उठी थी आखों से वो अश्रु-बूंदे.....मै तिरस्कार का पात्र था ...क्षमा मांगना चाहता था उससे ...उसके निश्छल प्रेम से ...लेकिन वो चली गई ...उसकी वो अश्रु-बूंदे और मेरी क्षमा याचना ...दोनों ही अव्यक्त /शापित ......"...



"
 मेरे जीवन के  सूनेपन में कुछ धुंधली स्म्रतियां शेष
कुछ काटों की चुभन और कुछ पुष्पों के कोमल अवशेष

है एकांत किन्तु सन्नाटे मैं भी है  एक कोलाहल
रह रह कर क्यों याद हैं आते बीत गए वो बीते पल

क्यूँ  याद आता है उसका पथ पर मिलना फिर थम जाना
नयनो  से अभिनन्दन करना नयनो  से ही शर्माना

क्यूँ  याद आता है उसका छत पर बालों को झटकाना 
क्यों याद आता है उसका आती हूँ कह कर खो जाना

क्यों याद आता है उसका ऊँगली में आँचल को कसना
और मेरी बातो को सुन पागल कह कर खुल कर हँसना

भूल जाओ मुझको, कह कर उसका वह  रोना याद आता
और जहां मिलते थे हम वो बाग़ का कोना याद आता

यांदें ...यादें ...यादें ही अब शेष रही सुने मन में
ठहर गए इस नीरस जीवन के नीरस सूनेपन में ............।....बस यूँ ही ......

Sunday, February 24, 2013

भक्त जनों ........................

कितना अपार आनंद है .परम् संतोष है इस सात दिवसीय रामकथा में .....आप सब कितने भाग्यशाली है जो इस रामकथा को सुनने का सोभाग्य आप सबको मिला ........

१) जैसा की आप सभी को ज्ञात है इस तरह के आयोजन में सवा लाख, डेढ़ लाख तक का खर्चा आता ही है .तो अधिक अधिक सहयोग कर इस आयोजन और स्ययम के जीवन को सफल बनायें .

२)  कल राम कथा का चौथा दिन है .राम जन्मोत्सव का परमानन्द प्रसाद स्वरुप आप सबको ग्रहण करना है . .रामजन्मोत्सव पर भेंट स्वरुप मातायें -बहने पूर्ण श्रद्धा से न्योछावर अर्पित करेंगी .

३) आप सभी माताओं -बहनों का अनुरोध है की महाराज जी हमारे घर पधारें .भोजन ग्रहण करे जिससे की हमारा घर ,हमारा जीवन पवित्र हो . हम आपकी भावनाओ को समझते है किन्तु प्रत्येक के घर जा कर भोजन ग्रहण कर पाना संभव नहीं तो जो भी श्रद्धालू /भक्त भोजन करवाने की इच्छा रखते है वो यंहा पांडाल में 55OO / (पचपन सौ )रूपये जमा करवा कर वही सौभाग्य और आनंद प्राप्त कर सकते है ...आज कथा को यहीं विश्राम देते है ........बोलो सिया बल राम चन्द्र जी की जय ...................................................................

....................मित्रों यह हमारे मोहल्ले में चल रही रामकथा का संवाद है जैसा सुना यहाँ लिख दिया ..........लेकिन उसके पश्चात मन दुखी हो गया .....मोहल्ले की नाली साफ़ करने वाले  स्वीपर को  20-20 देने के नाम पर झगड़ पड़ने वाले , छोटी -छोटी बात पर अपने पड़ोसियों से झगडा करने वाले ,छोटी -छोटी मूलभूत सुविधाओं के लिए भी सरकार /प्रशासन को कोसने वाले लोग , स्वार्थ  और अज्ञानता से स्ययम का ही नहीं अपने आस/पास के लोगो का भी अहित चाहने वाले .....इस प्रवचन से कितना लाभ उठा पायेंगे कह नहीं सकता .......कथावाचक महाराज और उनकी शिष्य मंडली का लाभ सर्व विदित है ......

.......कोई रोकता क्यूँ नहीं ये सब ....बताता क्यूँ नहीं कि इन ढोंगियों के बुद्धिचातुर्य को सुनने  की बजाये ...एक क्षण को पूर्ण शांति के साथ अपने मन की सुने ....मन के भीतर की कड़वाहट को बाहर फेंक ...मन के भीतर प्रेम का प्रवेश होने दे ....प्रेम अपने प्रति /दूसरों के प्रति ....यह कार्य बिना दान -दक्षिणा के भी संभव है ....और बिना भव्य धार्मिक आयोजनों के 

Thursday, January 24, 2013

अपनी नज्मों /कविताओं में गहन मौन के साथ विचरने वाले मन के प्रति ....आपके मन से निकली इस मौन प्रार्थना का असर परमात्मा पर जरुर होगा ....आदरणीय संध्या जी .....
ये   रात का घनघोर तम   छट जायेगा
नवरंग भर अम्बर पुनः मुस्कायेगा
 विकराल क्षण हैं  काल के तो क्या हुआ
 



Monday, January 7, 2013

आदरणीय निशा जी ....क्या बात है ...सुन्दर ...बहुत सुन्दर .....
"तेरे ही दुःख तड़पाते हैं  
तेरे ही सुख करते हैं सुखी".....प्रेम की पराकाष्ठ ..

 तेरे आने से महकते हम
ज्यूँ कस्तूरी महके वन में
तेरा जाना कांटे सा चुभे  
इस सूने एकाकी मन में .......मिलन के उस अद्भुत रोमांच , उस अप्रतिम उत्साह को जिस कुशलता से आपने वाणी दी ....बधाई ....बहुत बधाई ........साथ ही .विरह के क्षणों के दंश भोगते एकाकी मन के साथ पाठक  मन भी उसी गहन वेदना को महसूस करता है ...बड़ी ही सहजता से उस पीड़ा को कह दिया आपने ......जय हो ......

"तेरे -मेरे "........बीच बस एक पंक्ति का ओचित्य समझ नहीं पा रहा हूँ ..............
खिलते फूलों का रस पीने  
कोई भंवरा ना मंडराया ! ......प्रेम के मिलन और विरह के बीच ....मन एकाकी /तन एकाकी ......उस पर खिलते फूल और भंवरों के न मंडराने का बोध ....इस सुन्दर गीत की गति में बाधा है .....ऐसा मेरा वतिगत मन्ना है ....निश्चित ही "प्रेम " भाव ... अनंत संभावनाओ  से भरा भाव है ...जितना भी सुन्दर लिखा जाए ...और सुन्दर हो पाने की आशा रहती है ....मै इस सुन्दर गीत के प्रति भी वाही आशा रखता हूँ ....सादर ....

Saturday, January 5, 2013

............बस यूँ ही ..................

""कुछ  बोलना गुनाह हुआ है तो क्या करे


अब देश चारागाह हुआ है तो क्या करे

सच बोलने के जुर्म में रुसवा किये गए

हर झूठ वाह -वाह हुआ है तो क्या करे"...............

तबसे वो चौखट
रौशन है
और
हर शाम मैं
दिया बन जाता हूँ ..
मुफलिसी को क्या खूब सूफियाना अंदाज दिया आपने .....


आदरणीय शुक्ल जी ....प्रतीकों के साथ उपस्थिति ... भावों की प्रस्तुति का सहज किन्तु गंभीर माध्यम है  .....इसमें छोटी  सी भूल ...अर्थ का अनर्थ कर जाती है ......जैसा की आदरणीय तयाल  जी ....सिया जी  ने इंगित किया .....सादर ....

"आदरणीय दिव्या जी ....आज आपने अपनी इस सुन्दर ,सारगर्भित ,मर्मस्पर्शी रचना के माध्यम से .... उस स्वर को वाणी दी जिसका आज उदघोष होना चाहिए ...स्त्री -पुरुष के के बीच सदैव ही एक विभाजित रेखा खीचने का काम किया गया ....फिर वह चाहे साहित्य चिंतन रहा हो ....समाज शास्त्रीय विश्लेषण , अथवा जन-आक्रोश ....यही वजह है की हर घटना के पश्चात् ...स्त्री अपने दायरे में सिमट जाने ,लौट जाने के लिए विवश हुई ...वहीँ पुरुष मन आहत ,अपमानित ....जबकि आवश्यकता इस बात की है कि ...स्त्री-पुरुष के बीच खिंची गई इस रेखा को पूरी तरह से मिटा कर ....परस्पर विश्वसनीय ,पारदर्शी वातावरण निर्मित किया जाए .....आपने इस सुन्दर रचनाके साथ ...गहरे भाव उकेरे ....वहीँ एक गंभीर सन्देश भी प्रेषित करने में पूर्णतः सफल रही .....सादर ".................आदरणीय नवल जी आप सोच रहे होंगे ....आपकी पोस्ट पर " दिव्या जी '' का संबोधन ......दरअसल यह प्रतिक्रिया कुछ दिनों पूर्व उनकी बहुत ही सुन्दर ....मर्मस्पर्शी रचना ...पर दी थी ...काव्य-शैली में निश्चित  ही भिन्नता है .....किन्तु स्वर और भाव दिव्या जी और आपकी इस अद्भुत रचना में ठीक एक जैसे है ......न किसी प्रकार का वैचारिक आडम्बर ....न कोई आरोप -प्रत्यारोप ...न ही किसी प्रकार के साहित्यिक घडियाली आसूं .....स्त्री -पुरुष के बीच के सत्य को ...उतनी ही सुन्दरता से उकेरती इस सुन्दर रचना के लिए .......ह्रदय से बधाई .....साथ ही धन्यवाद .....इन विषम क्षणों में इतने सुन्दर /सत्य भावों को काव्य-रूप में ढालने के लिए ........सादर ......................

Wednesday, January 2, 2013

" आज स्ययम जागृत होने ...सभी को जागृत करने का समय हैं ...यह कठोर दंड प्रावधानों से हो पाए ...संदेह है ....लेकिन वैचारिक शुचिता के साथ जीवन के हर क्षेत्र में सांस्कृतिक ,आध्यात्मिक ,नैतिक  आन्दोलन से यह पूर्णतः संभव होगा ...ऐसा मुझे विश्वास  है ...नव विचारों के साथ, हम सब युवा हैं ....तो चलो सब मिल ..... ......."अंधेरों की तरफ ...विकृतियों की तरफ ....अज्ञानता की तरफ .../ इन्हें  परास्त  करने के लिए ...सभ्य  समाज गढ़ने के लिए ....