Friday, June 10, 2011

haaru ya fir jeetu

है बहुत हारा हुआ मन
थक चूका संघर्ष से तन
है बहुत हारा हुआ मन .....

शुष्क स्वप्ने फिर से सींचू
क्या समय का चक्र खींचू
या शिथिल कर दू स्यम को
सत्य से फिर आँख मिंचू

अंत है या है ये उद्गम
है बहुत हारा हुआ मन  .....

मै स्यम को खो चुका हूँ
फिर भला मै क्यूँ रुका हूँ
आस क्या विस्वास कैसा
व्यर्थ प्रश्नों में जुटा हूँ

अंत को कर दूँ समर्पण
है बहुत हारा हुआ मन ....

शब्द को सद्भावना दूँ
आह को नव-व्यंजना दूँ
या कलम कविता को अपनी
फिर कोई सम्भावना दूँ

त्याग दूँ क्या मै विसर्जन
है बहुत हारा हुआ मन .........
                                                              शुक्रवार ७.३० रात्रि


(अपने  कुछ अप्रवासी (कलमकार) दोस्तों से एक निवेदन )जो की इस समय अमेरिकी यात्रा पर है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

घर का आँगन टेढ़ा -मेढ़ा जैसा भी हो सुन्दर है
देश का सावन सुखा -भीगा जैसा भी हो सुन्दर है

गैर की बगिया के फूलो की खुशबु से है क्या लेना
अपना मधुबन खिले न खिले जैसा भी हो सुन्दर है

माँ कहती थी अपनी थाली का भोजन ही अच्छा है
चाहे छप्पन भोग न सही जैसा भी हो सुन्दर है

सुना है खूब तरक्की की है उसने पिछले सालो में
मेरा पिछड़ापन मेरा है जैसा भी हो सुन्दर है .............शुक्रवार ८.१३ रात्रि


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