Saturday, November 26, 2011

"हे ईश्वर इस तरह इंसानियत फिर कभी शर्मसार न हो ...२६/११...और कोई नई  तारीख इसे न दोहरा पाए .........

" चंद शक्लों  ने ही नफ़रत की फसल बोई है
  अनगिनत शक्ल मोहब्बत की अजां देती है

   बम, बारूद ,धमाके, ये वहशियाना जूनून
   भूल लम्हात की सदियों को सजा देती है

   माँ सुला पाई है मुश्किल से नन्हे बच्चों को
   वक़्त की सिसकियाँ फिर-फिर से जगा देती है

   है सियासत की भी हर बात निराली यारों
   खुद को हमदर्द जता  दर्द बढ़ा देती है.................."

Tuesday, June 21, 2011

जीवन में उल्लास जरूरी ,कोई अपना पास जरूरी
धरती के अस्तित्व के लिए ,होता है आकाश  जरूरी

                              दुःख मानव की नियति नहीं है
                              सुख भी अंतिम सत्य नहीं
                              जीवन के इस महामंच पर
                              होता है नेपथ्य नहीं

मीलो तक चलते जाना हो, तो एक क्षण अवकाश जरुरी
जीवन में उल्लास जरुरी, कोई अपना पास जरुरी .................!
                                                                                                     १२/१२/२०००
मुझसे ना पूछिए मेरी बरबादियों का जिक्र
मै अपनी वफाओ की सजा काट रहा हूँ

जो दर्द है उसको दबाये रक्खा है दिल में
जो है सुकून सब में उसे बाँट रहा हूँ

अब क्या कंहू की वो ही मुझे जानता नहीं
हर लम्हा जिंदगी में जिसके साथ रहा हूँ

कोई मुझे सुबह की तरह क्यूं करे सलाम
मै सदियों छत पे पसरी हुई रात रहा हूँ

जो हो सकी ना पूरी अधूरी ही रह गई
दुनिया की निगाहों में वही बात रहा हूँ

तनहाइयों में बैठ कर गुजरे हुए कल से
मै जिंदगी और मौत के पल छाँट रहा हूँ ....!
                                                                               १७/०५/२०००
दे दो हमको रोटी कपडा दे दो हमको एक मकान
तभी पढाओ बच्चो को, आज़ाद हमारा हिंदुस्तान .......

सदा नीव बनते आये हम यह इतिहास बताता है
छत का यशोगान जाने क्यूं, सारा जग ही गाता है

छत का नहीं नीव का पहले, तुम करना सीखो सम्मान
तभी पढाओ बच्चो को, आज़ाद हमारा हिंदुस्तान .....
सो  रहे राष्ट्र के जन-जन को हम आज जगाने निकले है
बारूद बिछा है इधर-उधर हम आग लगाने निकले है

                          देखे हममे कितना बल है
                          है सत्य आग्रह या छल है
                          देखे कितना भारी, भीषण
                          मन के भीतर दावानल है

जो स्वप्न सजोये  आँखों ने हम उन्हें सजाने निकले है
बारूद बिछा है इधर-उधर हम आग लगाने निकले है .............११/०३/२०००

                          जो कायर हैं वह हट जायें
                         जो वीर हैं पथ पर डट जायें
                         कर के  सब मृत्यु का आज वरण
                         जीवन संग्राम में जुट जायें

क्रान्ति प्यासी देवी को निज रक्त पिलाने निकले हैं
बारूद बिछा है इधर-उधर हम आग लगाने निकले है ............
मै नारी हूँ ......................


है कठिन धेर्य मेरा गहना
दुःख ,पीड़ा मुझको है सहना
निज हांथो स्व-अस्तित्व मिटा
आधीन दूसरो के रहना

मै धेर्य-धर्म-व्रतधारी हूँ
मै नारी हूँ .......................
बहुत है सब्र सीने में
कंही ये टूट न जाए
किनारों ने बगावत की
समंदर सूख न जाए .....

कई चिनगारिया शोलो में
है तब्दील होने को
हजारो आँख बैठी है
नए सपने सजोने को 

संभल जाओ, किसी भी
पेट में अब भूख ना आये

किनारों ने बगावत की
समंदर सूख  ना जाये............

"आज कलम के पास नहीं है प्यार और मनुहार की बाते
आज कलम के पास नहीं है रूप और श्रृंगार की बाते
आज कलम के पास नहीं है पायल और झंकार की बाते 
आज कलम के पास नहीं है तीज और त्यौहार की बाते
आज कलम लिखने वाली है आग भरे संवादों को
आज कलम लिखने वाली है  मानवता से , वादों को
आज कलम लिखने वाली भूखी नंगी फरियादो को
आज कलम लिखने वाली शोषित जन की आवाजो को 

आज कलम उदघोष  करेगी ,इन्कलाब को तोलेगी
 आज कलम प्रतिरोध  करेगी वन्दे-मातरम बोलेगी ..................................."

Saturday, June 11, 2011

ginij book of world ricord

देश वासियों ,
                        बहुत-बहुत बधाई . अभी-अभी गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड की तरफ से एक और रिकार्ड की घोषणा की घोषणा की गई है ....इस रिकोर्ड की दोड़ में वैसे तो जार्ज बुश  ,मुससर्रफ, गद्दाफी , अमर सिंह ,कलमाड़ी ,ए.बी .सी.डी....राजा, जैसे और भी बहुत से राष्ट्रीय,अंतराष्ट्रीय शक्सियत थी लेकिन इन सभी को पीछे छोड़ते हुए इस रिकॉर्ड को अपने नाम किया है....महापर+आक्रमि , पवित्र-शुद्ध बडबोले  बाज....श्री श्री दिग्विजय सिंह जी ने . जी  हाँ भाइयों सबसे कम समय में सबसे अधिक गालियाँ खाने  का ये वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है हमारे राष्ट्रीय नेता दिग्गी साहब ने ......तो हो जाए एक और .....न ...न... न ....आज तो बस ताली...

Friday, June 10, 2011

haaru ya fir jeetu

है बहुत हारा हुआ मन
थक चूका संघर्ष से तन
है बहुत हारा हुआ मन .....

शुष्क स्वप्ने फिर से सींचू
क्या समय का चक्र खींचू
या शिथिल कर दू स्यम को
सत्य से फिर आँख मिंचू

अंत है या है ये उद्गम
है बहुत हारा हुआ मन  .....

मै स्यम को खो चुका हूँ
फिर भला मै क्यूँ रुका हूँ
आस क्या विस्वास कैसा
व्यर्थ प्रश्नों में जुटा हूँ

अंत को कर दूँ समर्पण
है बहुत हारा हुआ मन ....

शब्द को सद्भावना दूँ
आह को नव-व्यंजना दूँ
या कलम कविता को अपनी
फिर कोई सम्भावना दूँ

त्याग दूँ क्या मै विसर्जन
है बहुत हारा हुआ मन .........
                                                              शुक्रवार ७.३० रात्रि


(अपने  कुछ अप्रवासी (कलमकार) दोस्तों से एक निवेदन )जो की इस समय अमेरिकी यात्रा पर है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

घर का आँगन टेढ़ा -मेढ़ा जैसा भी हो सुन्दर है
देश का सावन सुखा -भीगा जैसा भी हो सुन्दर है

गैर की बगिया के फूलो की खुशबु से है क्या लेना
अपना मधुबन खिले न खिले जैसा भी हो सुन्दर है

माँ कहती थी अपनी थाली का भोजन ही अच्छा है
चाहे छप्पन भोग न सही जैसा भी हो सुन्दर है

सुना है खूब तरक्की की है उसने पिछले सालो में
मेरा पिछड़ापन मेरा है जैसा भी हो सुन्दर है .............शुक्रवार ८.१३ रात्रि


Wednesday, June 8, 2011

kuchh shabd

१)"आज  ये झोंके हवा के तेरी खुशबु लाये है
यूँ लगा है फिर से जैसे हम जंवा हो आये है "


२)" मेरी गजलों से आती है ये कैसी खुशबु
    कल भी उसने चूम कर शायद इन्हें रख्खा होगा "

३) "मै परेशां हूँ ,उसे कह भी नहीं पाता हूँ
    मुस्कुराता हूँ मगर वो समझ ही जाती है "

ak geet- hajare sahab ke liye

राजघाट में फिर से देखो गाँधी बाबा आये है
दूर तिमिर को करने हेतु नई रौशनी लाये है
राजघाट में ....................................................

सच फिर से उठ खड़ा हुआ है अहंकार के सामने
इन्कलाब फिर बोल दिया है हर रहीम हर राम ने
कितनी भी मक्कार हो दिल्ली अब तो रुकना ही होगा
भ्रष्टतंत्र को प्रजातंत्र के सम्मुख झुकना ही होगा
सत्य  अंहिसा मुरझाये थे आज पुनः लहराए है
राजघाट में फिर ...............................................

हर निराश मन में नव आशाओं का है अब दीप जला
आज पुनः दीवानों का टोला है सडको पर निकला
आज पुनः सोई कविता को मिली नई अंगड़ाई है
आज पुनः  हर घर आँगन में नई हवाएं आई है
आज पुनः  शोषित हर मन ने नए तराने गाए है
राजघाट में फिर से देखो गाँधी बाबा आये है
दूर तिमिर को करने हेतु नई रौशनी लाये है..........बुधवार  ३.४५ दोपहर

rajghat se...

आज हवाओं  ने  भर दी है सांसो में है आग नई
जज्बातों की वीणा ने छेड़ी है कोई राग, नई

कलम कवी से रक्त मांगती कविता के प्रतिदान में
आज कलम फिर से बोलेगी इन्कलाब की शान में

आज पुनः हर एक कंकड़ शंकर-शंकर हो जायेगा
आज पुनः सच और झूट का सारा भ्रम छट जायेगा
आज पुनः संघर्षो को आवाज नई दी जाएगी
आज पुन अंधियारों में एक नई रोशनी आएगी
आज पुनः लाठी ,बंदूके जज्बातों से हारेगी
आज पुनः गाँधी की वाणी अहंकार को मारेगी ......बुधवार २.३० दोपहर




Tuesday, June 7, 2011

मेरे प्यारे दोस्तों ,
                         शुभ  रात्रि...एक अच्छी सुबह के लिए नहीं कह सकता ...क्यूंकि हम हार रहे है .कुटिल राज नीति के हांथो .बात बाबा की नहीं ,बात दुसरे कुछ चेहरों की नहीं ...बात है मुद्दों की ...चेहरे उजागर किये जा रहे है चोरो के द्वारा ...मुद्दों को मार दिया गया ...हम बाबा के लिए नहीं लड़ रहे थे ...न ही हजारे जी के लिए ...हम उनके साथ थे क्यूंकि वो हमारे मुद्दे उठा रहे थे ...हमारे साथ खड़े थे. राजनीती हमे चोर साबित करने पर तुली है ...डाकू फिर से सडको पर आ गए है( सोनिया जी द्वारा अधिकृत )...सत्य को भ्रमित किया जा रहा है ...सदभावनाओ को डराया जा रहा है ...और हमें चेतावनी दी जा रही है की चुप रहो ...तो क्या हम चुप हो जाये ...दोस्तों सरकार को पूरी ताकत लगाने दो ...बस हमारी कोशिश होनी चाहिए की राजघाट सूना ना होने पाए ...क्रांति की अलख जगी है जलती रहनी चाहिए .....कल फिर मुलाकात होगी ...शुभ रात्रि .....मंगल...१०.३१ रात्रि

shrigar ras ki ak kavita par tippni

आज छोडो प्यार की मनुहार की बाते सभी
छोड़ दो इकरार की ,इंकार की बाते सभी
आज तो बस आह उगलो आग की बांते करो
आज तो बस दब चुकी आवाज की बांते करो ....
                                                                                  रविवार ७.४५ रात्रि

joota kand part-2

ताजा खबर  .....अभी-अभी एक जूता राजस्थान में जप्त हुआ है...कल उ .प्र . में होगा ...फिर एम.पी. में ...फिर बिहार ,पंजाब ..फिर ..फिर.. फिर.. दिल्ली में १० जनपथ के सामने जूतों की सेल लगाई जाएगी ...एतिहासिक जूते होंगे ...आइये सेल में आपका स्वागत है ...सोमवार ४.५० संध्या

p.m.sahab jinda hai

बधाई हो दोस्तों ,
                            हमारे पी.एम.साहब अभी जीवित है ...अभी थोड़ी देर पहले ही बोले है (बेचारे कोमा में थे )...उन्होंने कल की घटना को दुर्भाग्य पूर्ण कहा है ...अरे पी .एम .साहब दुर्भाग्य पूर्ण तो आपका कोमा से बाहर आना है ...जाइये सो जाइये ....सोमवार ९ रात्रि

joota kand part-1

एक आदमी ने जूता दिखाया ..और मार खाई..एक आदमी ने (घोर निंदनीय पी.एम.साहब )ने लाठी चलवाई ,अश्रु गैस के गोले दगवाये ...और वो आराम से है ...मेरा देश महान....सोमवार ९.३० रात्री

beeti rat itihas ki sabse kali rat- baba ramdev

बाबा काश की आप राजनैतिक चालों को भी समझ पाते ...तो ये भ्रम की स्थिति निर्मित नहीं होती. जब मुद्दों के साथ जन भावनाये जुडी हो तब सब कुछ पारदर्शी होना चाहिए ...हारे आप नहीं है हरी तो वो लाखो ,करोडो जनभावनाए है जो आपके साथ चल रही थी ...आज उल्लुओ और कौओ के गुगुनाने का दिन है ....आज सत्य की कोयल का गला घोट दिया गया ...इसकी कुछ जिम्मेवारी आपकी भी बनती है.............रविवार  ४.३८ प.म.

Monday, June 6, 2011

kusum thakur profile....

कुसुम जी ,७.१२ पर मैंने अपनी राय जाहिर कर दी थी ...जनता तो भोली है या शायद उसकी मजबूरी है भरोसा करना . वो चाहे नेता हो या समाज सेवी , या फिर एक बाबा ....अब इसके आगे क्या ? क्या खुद सड़क पर आ जाये बिना किसी नेतृत्व के ...प्रार्थना कीजिएगा वो दिन कभी न आये.आपातकाल को हम सब ने मिल कर झेल लिया ...लेकिन बिना नेतृत्व के जब जनता सड़क पर आएगी तो वह क्रांति रक्त क्रांति होगी ...न हम झेल पाएंगे न देश ....शनिवार ९.३९ प.म.

ramdev ji ka anshan loktantra ke dayre me...

कुसुम जी , आर्यावर्त की इस न्यूज़ पर मैंने अपनी राय जाहिर की है . आने वाले दिनों में यदि मेरा कथन गलत साबित होता है तो मुझे ख़ुशी होगी ...क्यूंकि ये अहम् की नहीं वरन वजूद की लड़ाई है .सही साबित होने पर अपनी राय जरुर जाहिर कीजिएगा ...शनिवार ७.२८

kusum thakur profile....

रामदेव का अनशन लोकतंत्र के दायरे में )
अभी संध्या के ७.१२ हो रहा है ...मै टेलीविज़न के सामने हूँ ...और देख रहा हूँ आम आदमी के भरोसे को ...करोडो लोगो की भावनाओ को एक बार फिर छला गया ...प्रजा फिर मंत्र और तंत्र के हांथो लुट गई .होटल के ५ घंटे की मीटिंग में ही आन्दोलन का चीरहरण हो चूका था ...उसके बाद का पूरा घटना क्रम बाबा और दिल्ली का स्नेह मिलन ...भोले देश वासियों ये विजय का नहीं पराजय का अवसर है ...पराजय के शौक में उपवास करे ....शनिवार  ७.१२

Saturday, May 28, 2011

gazal

दर्द को आवाज़ दी तो साज़ पे आई ग़ज़ल
दर्द मीठा हो गया कुछ इस तरह छाई ग़ज़ल
तोहमतें,रुसवाइया,इलज़ाम कितने हों  मिले
प्यार का जब जिक्र आया फिर से लहराई ग़ज़ल
उसने देखा था मेरे हर एक ख़त को बार-बार
याद आते ही वो लम्हे कई बार  मुस्काई   ग़ज़ल
माँ ने गिरने पर मेरे माथे को चूमा था कभी
माँ के अहसासों की नरमी आँख भर आई ग़ज़ल
अब सियासतदार भी करने लगे है शायरी
बस इसी एक सोच में है खुद से शरमाई ग़ज़ल

दर्द को आवाज़ दी तो साज़ पे आई ग़ज़ल .............................


Wednesday, May 18, 2011

मैंने कभी नहीं चाहा
...स्पर्श करूँ
मौन अधरों को तुम्हारे
चूम लू / आभा युक्त ललाट को
...या की तुम्हारी गति के साथ /लयबद्ध
तुम्हारे वाचाल वक्षो को ...
मैंने यह भी नहीं चाहा /एकांत में
तुम्हारे बालों की घनी छाया में
शांत करू मन की व्याकुलता
...तुम्हारी उँगलियों को छेड़
झंकृत कर दूँ /मन के भीतर
एक कोने में सुरक्षित रखी
वीणा के तारों को
......किन्तु...........
हमारे बीच
सदैव ही रहा
हमारे शरीरों का व्याकरण
अंगो के शब्दकोष
और उनमे से
झरता रहा /एक वाक्य
की हम रहेंगे सदैव ही
अपरिचित ....
संवेदना के धरातल पर ...................
                                                               २९/०५/2010
सदियों पहले मेरी ग़ज़ल को उसने चूमा था
उसकी आँखों में अभी तक है मोहब्बत का नशा .....
दिल तेरा जब आइना हो जायेगा
देखना तू क्या से क्या हो जायेगा
खेत में जब लहलहा झूमी फसल
मन धरा का भी गया थोडा मचल

जोश में आ कर कृषक ने तान छेड़ी
जोर से हंस दी वधु वह नव नवेली

त्याग कर संकोच भय की भंगिमाए
ग्राम बालाओ ने झट घुघंट हटाये

बैल भी उन्मुक्त हो कर मुस्कुराये
पक्षियों ने नव स्वरों में गीत गाये

बूढ़े बरगद से उतर शीतल हवा ने
भागते तेजी से बादल की छटा ने

टूटे खपरैलो की निर्धन झोपड़ी ने
गाय के नवजात शिशु की चौकड़ी ने

बिन कहे मुझसे बहुत कुछ कह दिया
और मैंने क्षण में एक जीवन जिया .........
                                                                       ०१/०४/2000

Tuesday, May 17, 2011

तुम स्वप्न बन आओ प्रिये ....

चेतन में है पीड़ा भरी
हर चोट मन की है हरी
हूँ लस्त-पस्त परास्त हूँ
है कल्पनाये डरी-डरी

कुछ क्षण सुखद लाओ प्रिये
तुम स्वप्न बन आओ प्रिये

हूँ मै अबोध डरा -डरा
मन मै है दुःख का विष भरा
सिर पर है नभ की क्रूरता
पांव में है तपती धरा

बन मेघ जल बरसो प्रिये
तुम स्वप्न बन आओ प्रिये 

विश्वास मेरा खो चुका 
जो था मेरा मै खो चुका 
हूँ विवस जीने के लिए 
है गहन तिमिर मै जंहा रुका 

अब दूर न जाओ प्रिये 
तुम स्वप्न बन आओ प्रिये
                                            १७/०५/11 

prem

है कौन स्वप्न बन कर आता
आहत मन को सहलाता
है कौन ................................

एकांत रात्रि में निशदिन
अपने यौवन का भार लिए
जो स्यम काम को मुग्ध करे
निज तन पर वह श्रृगार लिए

है मंद-मंद आ मुस्काता
है कौन स्वप्न बन कर आता ......

उसके अधरों की चंचलता
रह मूक बहुत कुछ कह जाती
अपने आलौकित नैनों से
आ चिर प्रकाश वह बरसाती

पा उसको जीवन तर जाता
है कौन स्वप्न बन कर आता ....

उसका स्पर्श भी अदभुत है
निर्जीव देह को प्राण मिले
छड भर समीप वह आ बैठे
तो जीवन को पहचान मिले

कैसा अदभुत है वह नाता
है कौन स्वप्न बन कर आता ........
                                                                १७/०५/11

Monday, April 11, 2011

kuchha shair

''सदियों  पहले  मेरी ग़ज़ल को उसने चूमा था
उसकी आँखों में अभी तक है मोहब्बत का नशा ''
२)अब गुजर जाये चाहे जन्हा जिंदगी
   चाँद सांसो का कारवां है जिंदगी
   तुमने हमसे कहा हमने तुमसे कहा
   इस तरह बन गई दास्ताँ जिंदगी "

३)तड़प कर जब भी इस दिल से कोई भी आह निकली है
   ज़माने ने सुना है जिक्र तेरी बेवफाई का "

४)कारवां कितने लूटे उजड़ी है कितनी बस्तियां
   आज कल अखबार में बस ये ही चर्चा आम है "

५)चलो अब अलविदा कह के तमन्नाओं की बस्ती से
   गुज़र के इस जंहा से दूसरा फिर एक जंहा होगा "
                                                                                   १२/०४/2011