आदरणीय राज जी ....जो छोटी सी त्रुटी आज आपसे हुई ...वह मै भी कर चूका हूँ पूर्व में ...अपने -आप को सही मान बहस करता रहा लेकिन जब शांत हो कर विचार किया ...मंच के नियमों ...दैनिक आयोजनों को निकट से समझा तो स्ययम से शर्मिंदा हुआ ....मंच के नियम ...मंच की गतिविधियाँ ....मंच का वातावरण सब कुछ ...सुन्दर ...व्यवस्थित ...सम्मानजनक है ....यहाँ -आना और जाना बहुत आसान है ...कोई बंधन नहीं /कोई बाध्यता नहीं .....लेकिन जायेंगे कहाँ ...क्या इससे सुन्दर व्यवस्थापन ....संचालन ....गतिविधियाँ अन्यत्र कहीं है .....और सबसे बड़ी बात परस्पर सम्मान का भाव रचनाओं के प्रति ...रचनाकारों के प्रति ....तो मेरा व्यतिगत आग्रह है आपसे ....यहाँ से जाने की बात न करे ...अपने मन के भावों को गायें -गुनगुनायें ....स्ययम हँसे -सबको हंसाएं ...फिर देखिएगा कितना आनंद आएगा ....मन की विनम्रता से कहता हूँ हूँ ....आप एक बार शांत मन से विचार करें ....सब सुन्दर हो जायेगा .....सादर ......
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