सिर्फ आयु के आधार पे किसी को वरिष्ट कहना काव्य परंपरा में गलत लगता है ....बेशक़ ....आपने बहुत सही बात कही ....वरिष्ठता का आकलन अनुभव के आधार पर होना चाहिए ....ना कि आयु के ....मै इससे थोडा आगे बढ़कर कहता हूँ ....आप-आप नहीं है ....मैं -मैं नहीं हूँ ...कोई कुछ भी नहीं है ...है तो सिर्फ विचार ...कोई विचार आपको आंदोलित कर बाध्य करता है शब्द-रूप देने के लिए ...कोई विचार मुझे ....तो इस तरह महत्त्वपूर्ण क्या है .....सिर्फ और सिर्फ विचार ...लेकिन आज के आधुनिक साहित्य समाज में हो क्या रहा है ...परस्पर लेन -देन की बनियागीरी ....नाम और पहचान के साथ रचनाओं /साहित्य तक पहुँचने की जुगलबंदी ....और ये कर कौन रहा है ....कोई पाठक नहीं ....कोई श्रोता नहीं ....सिर्फ हम और हमारा अहम् ....इस स्वार्थ के कारण न जाने कितनी ही सुन्दर /गहरी रचनाये ...अनदेखी हो जाती हैं ....कितने ही सक्षम नवोदित कलमकार ...स्ययम के सृजन पर आशंकित .....आत्मा से कहता हूँ ...ये पाप है ...जो साहित्य के नाम पर हम-आप ही कर रहें है ...आप युवा है जानना चाहता हूँ आपसे ....एक विचार है ....."क्यूँ न हर साहित्यिक मंच से नाम-पहचान हटा दी जाए ...चेहरें हटा दिए जाएँ ...विचार हों सिर्फ विचार ....विचारों के आधार पर ही ...उसकी सार्थकता /उसकी गराई /साहित्यिक -असाहित्यिक पहुँच की सराहना -आलोचना की जाए ..."...क्या ये संभव है ...और क्या इस विचार के समर्थन में आप आगे आना चाहेंगें .....मेरा यही प्रश्न है ...।
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