Monday, December 24, 2012

निश्चित ही अब जरुरत है और अधिक सख्त क़ानून की ,,,त्वरित न्याय की ....अब ये हो ही जाना  चाहिए ....हम सब यही चाहते है ....हम  सब "सही" चाहते हैं ...........लेकिन इसके साथ  ही हमें थोडा ठहर कर ....शांति से विचार करना होगा ...क्या सिर्फ कानून बदल देने से सब कुछ बदल जायेगा ...क्या फिर कोई "राक्षस"सिर नहीं उठाएगा ....कानूनी प्रावधान "रोग का निदान है ".....स्वस्थ होने की गारंटी नहीं ...पूर्णतः स्वस्थ एवं सुरक्षित रहने के लिए कानूनी प्रावधानों के साथ -साथ हमें भी बदलना होगा ...समाज में भी बदलाव  लाना होगा ....
1.अधकचरी आधुनिकता की चकाचौंध में खंडित -मंडित अवशेषों को हम अपना  आदर्श मान बैठे ....सिनेमाई संस्कृति को जीवन का सच ...अन्धानुकरण में हमने  खुद को पूरी तरह बदल डाला .....जो "सेक्सी " शब्द किसी महिला केलिए गाली की तरह होता था .....उस "सेक्सी लुक " के लिए हमने अपनी पहचान बदली ...परिधान बदला ....और तो और पूरी जीवन शैली ही बदल डाली ...हमारे  दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुयें विज्ञापन तय करने लगे ....और बाज़ार ने "स्त्री " को भी वस्तु बना दिया .....हम पढ़े लिखे हैं ....सभ्य भी है ..लेकिन क्या हमारे समाज  का हर तबका ....हर व्यक्ति भी उतना ही शिक्षित ...सभ्य .....
2."स्त्री विचार है ...वस्तु नहीं "
 ...क्या यह  भी  सख्त कानूनी प्रावधान हमें बताएँगे ....? या हमें ही तय करना होगा की चित्र हो ,चलचित्र हो ...घर हो बाहर हो ...विचारों में हो या प्रदर्शनों में हो ..."स्त्री " जहाँ भी हो अपने पूर्ण सम्मान ....गरिमा के साथ हो ...जो भी उसके सम्मान  ,गरिमा के साथ खिलवाड़ करे ...हम सब मिल , उसे प्रताड़ित करें ..फिर वो चाहे सरकार हो ....बाज़ार हो ...अशोभनीय प्रचार-प्रसार हो ...या घटिया सिनेमा की मार हो ......हम सबके द्वारा उन सभी माध्यमों का बहिष्कार हो .....और इसके लिए सबसे पहले "स्त्री" को आगे आना होगा .....और उसे कहना होगा ..."सावधान मै  सृष्टि की सबसे अनमोल रचना हूँ ...सबसे सर्वश्रेष्ठ विचार ....तुम मुझे भोग मत समझो ....मै  स्ययम को वस्तु  नहीं बनने  दूँगी "....स्त्री की इस हुंकार से दृश्य बदलेगा ...परिदृश्य बदलेगा ....समाज बदलेगा ......फिर कानूनी बदलावों की संभवतः आवश्यकता ही न रह जाये .......सादर .....

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