"आज का दिन उस प्रार्थना का दिन है ....आज का दिन विचार करने का दिन है ...आज का दिन ये शपथ उठाने का दिन है कि फिर कभी इस तरह का दिन कहीं न आने पाये ....तो आइये शुद्ध मन से विचार कर शपथ लेतें हैं कि ........
1) मै एक व्यक्ति के रूप में मानवीय संवेदना के साथ "स्त्री " की गरिमा और सम्मान का प्रहरी रहूँगा ...
2)मैं एक सदस्य के रूप में "स्त्री" के सम्मान ,अधिकारों को पारिवारिक सुरक्षा /मान्यता दूंगा ...........
3)मै एक शिक्षक होने के नाते बालमन को वो नैतिक वैचारिक आधारशिला दूंगा ...जिस पर चलकर मानवीय गुणों से पूर्ण हो वह स्ययम एवं समाज को सम्मान दें .....
4)मै बतौर अभिभावक तय करूँ मेरा बच्चा पूरी तरह से संस्कारित हो ...वह अपने अधिकारों के साथ -साथ ,अपने पारिवारिक /सामाजिक /नागरिक कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहे .........
5)मै आज प्राण करूँ की मेरे पेशे /व्यवसाय /सेवाओं में "स्त्री" विमर्श ..."स्त्री" की उपस्थिति ..."स्त्री "का उपयोग ..."स्त्री"की पूर्ण गरिमा ....और सम्मान के साथ हो ....
6) एक कलाकार होने के नाते मैं तय करूं कि कला के किसी भी माध्यम में "स्त्री " का कलात्मक प्रदर्शन हो ...देह-दर्शन और उत्तेजना से परे ...संवेदनात्मक आधार पर "स्त्री" को चित्रित /प्रस्तुत करूँ ....अपनी कला के माध्यम से "स्त्री "के ओज और स्वाभिमान का वाहक बनू ........
और सबसे अंत में ..............................................................
7)एक युवा के रूप मैंने नित नई भौतिक सफलताएँ अर्जित की हैं ....मुझे और आगे बढ़ना है ....लेकिन इस शपथ के साथ कि मै अपना "आदर्श" चुनने में पहले से अधिक संवेदनशील हो कर ...सामाजिक मूल्यों /,मान्यताओं के बीच स्ययम की गरिमामय उपस्थिति के साथ ...एक नई दिशा ...नया विचार सृजित करूँ ........
.........................................यह संभव है ...हम सब चाहें तो ऐसा कर सकते हैं ....और यदि ऐसा हो सका तो निश्चित ही सख्त कानूनी प्रावधान / त्वरित न्याय विधान /प्रशासनिक संवेदनशीलता के बीच इस तरह का अमानवीय दृश्य फिर कभी सामने आ ही ना पाये ....हम पुनः मानव होने का सम्मान प्राप्त कर पायें ......सादर।
नियम भंग न हो ...सिर्फ इस विचार से मन की वेदना को विस्तार दे रहा हूँ .....आप सम्मानित मित्रों से "काव्यात्मक पंक्तियों " पर नहीं ...प्रस्तुत विचार पर सहभागिता चाहूँगा ...सविनय .....
"तय करो, न फिर से ये मंज़र दिखे
तय करो, न जिंदगी ऐसे रुके
तय करो, न आबरू से खेल हो
तय करो, न इस तरह अंधेर हो
तय करो ,अब वक़्त तय करने का है
तय करो ,अब वक़्त ये लड़ने का है
उठ चलो ,मिल कर सभी आवाज दो
अधजले पंखों को फिर परवाज़ दो
ये कोई कविता नहीं ,बस एक दुआ है
फिर कभी न हो, जो बीते कल हुआ है ............................
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