लदा फदा इसको जब देखा
सजे घोंसले यहाँ वहाँ
छाँव बटोही ने पायी पर
विष्ठा विसर्जन भेंट किया
नोच किसी ने पत्ते टहनी
सोचो कितना तडपाया होगा
याद किया जो लुटना पल छिन
जर्जर वटवृक्ष रोये सिसके............सृष्टा द्वारा रचित सृष्टि .......मानव ......सृष्टि नियमबद्ध .....मानव स्वार्थ बद्ध ....सृष्टि ने ...नदी-पहाड़ों ,जंगल झरनों ,धूप -वृक्ष ...एक-एक कण को अपने स्नेह से सिंचित किया .....मानव ने सृष्टि के कण -कण को निज स्वार्थ से दंशित किया ....सृष्टि अभी तक मौन है .....क्यूंकि ...उसकी पीड़ा को समझने -गाने वाला कविमन उसकी पीड़ा को अपनी वाणी दे रहा है ...और बखूबी दे रहा है .....आदरणीय नवल जी जिस गहन संवेदना के साथ आपने इस पीड़ा को काव्यरूप में ढाला ....मन को छू गया ....
अंबर सा आँचल इस पर भी
होगा कभी तो तना हुआ
पोषित हो उर्वर प्रकृति से
हरा भरा मुस्काया होगा ............एक चित्र खींचती हुई पंक्तियाँ ...न जगाती है ....न हिलाती ...बस जडवत कर ....आँखों से अश्रु बूँद बह आती है ....और वह अश्रु-बूँद ही इस मर्मस्पर्शी रचना का पुरुष्कार है .......सादर नमन करता हूँ रचना को ...आपको ....सादर ......
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