Thursday, December 27, 2012

आदरणीय नवल जी ....ह्रदय की पूर्ण श्रद्धा से आपको सादर नमन ...आपने मेरी रचनाओ की अनुपस्थिति को उतनी ही गभीरता से लिया ....ये मेरे लिये व्यतिगत तौर पर बड़े सम्मान की बात  है ....आपका स्नेह ही है जो हम  सब मित्रों को आपके सम्मुख नतमस्तक कर देता है ....सत्य मानियेगा ....अपनी रचनाओं के साथ मंच पर न पहुँच पाने का मुझे भी दुःख है ....किन्तु मेरे व्यतिगत प्रयास <रचनाये > समयाभाव और साधनहीनता की वजह से , मुझे अन्य  सम्मानित  मित्रों की रचनाओं ....एवं मंचीय गतिविधियों में सक्रीय भूमिका निभाने में बाधित कर रही थी .....!1 घंटे का समय ...नेट की विवशता .....स्व-रचना पर  आई प्रतिक्रियाओं का लोभ .....यही सब कारण थे  मेरे उस निर्णय के पीछे .....मुझे पूर्ण विश्वास  है आप मेरी भावनाओ को भली-भांति समझ जाते है ......इस निर्णय पर भी मुझे  आशीर्वाद दीजिये ......हाँ जिस दिन "नेट कैफे "की बाध्यता से मुक्त जाऊँगा ....दिल खोल कर गाऊंगा /गुनगुनाऊंगा ...विचारों को नवीन आग्रह से स्वीकार करने का बोध आपसे ही मिला ....इसलिए आप मेरे लिए गुरुतुल्य है ....आपके आदेश की अवज्ञा कर रहा हूँ ...क्षमा कीजिएगा ............
"दुःख मानव  की नियति नहीं है
 सुख भी अंतिम सत्य नहीं
 जीवन के इस महामंच पर
 होता है   नैपथ्य नहीं

 मीलों  तक  चलते जाना हो
 तो एक क्षण अवकाश जरुरी ........यह अवकाश मात्र है ...आप आशीर्वाद दीजिये की मेरे हालात कुछ बेहतर हो और मै अधिक से अधिक समय आपके स्नेह और सम्मानित मंच पर बिता सकूँ .....बतौर रचनाकार ...बतौर पाठक .....सादर ......

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