Tuesday, December 11, 2012

....उस दिन रू-ब -के दरमियाँ एक जिज्ञासा ज़ाहिर की  किया ...लेकिन दुर्भाग्य-वश आज के आधूनिक संवेदनाओं में वैचारिक पीड़ा को भी  व्यतिगत मान लिया जाता है ...."व्यक्ति से विचार" बन जाने का वो आग्रह कई घंटों तक परेशान  करता रहा ...सोचता रहा यह किस तरह संभव है ..."अचानक याद हो आई ....बापू  से हुई मुलाकात  ....मैंने पूछा था उनसे ...आप गांधी से विचार कैसे बने ....वो हंस दिए "सत्य ,अहिसा ,अपरिग्रह ,आत्मिक उत्थान ....यह सब कुछ मुझसे पहले भी था ...बस मैंने इतना भर किया की इन विचारों /सिद्धांतो के आह्वान के पहले "स्व " को शांत किया ...स्व को शांत करते ही मेरी व्यतिगत आवश्यकताएं ,महत्वाकांक्षाये यहाँ तक की मै स्ययम भी अर्थहीन हो गया ..स्ययम का नहो कर सबका हो जाना ही तो "विचार "है ......वो पुनः हंस दिये " मैंने पुनः प्रश्न किया बापू विचार बन पाना क्या इतना ही सहज है ....बापू गंभीर हो गए ..पूछा "क्या-क्या है तुम्हारे पास ...जो भी था मैंने उन्हें बताया ...उन्होंने कहा सबको स्वाहा कर दो ...मैंने कर दिया ...उन्होंने कहा क्या और कैसा दीखता है ...मैंने कहा आप दिख रहें है ....मैं  दिख रहा हूँ ...आस-पास सब  कुछ दिख रहा है ..वो पुनः मुस्कुराये "अब अपने इस मै को बाहर खींच स्वाहा  कर ...किया ....और अचानक एक ही क्षण में सब कुछ बदल गया ...ना मै ...ना गांधी ... न कुछ अन्य ....था तो बस विचार ...सम्पूर्ण दृश्य ...सम्पूर्ण चल-अचल ...सम्पूर्ण सृष्टि ...मात्र विचार ....."भले ही यह वार्ता अवचेतन में घटी हो ....लेकिन व्यक्ति से विचार बन पाना है महत्त्वपूर्ण ... अब मै  इसी महत्त्व के साथ इस सम्मानित मंच पर विचरना चाहता हूँ ...सुन्दर -सुन्दर रचनाओ के माध्यम से सुन्दर -सुन्दर विचारों को ग्रहण करना चाहता हूँ ....वैचारिक तटस्थता के साथ इस सम्मानित मंच पर आना चाहता हूँ और यह तभी संभव है जब मै स्ययम के ...स्ययम के सृजन के स्वाभाविक मोह से बाहर आऊँ  ...मन की निश्छलता के साथ अपने भीतर के "मै और मेरा " को विश्राम दूँ .....एक रचनाकार के रूप में मंच पर यह मेरी अंतिम प्रस्तुति है .....लेकिन एक विचार रूप में अब मै  और अधिक सक्रियता के साथ इस सम्मानित मंच पर .....सुन्दर रचनाओं तक ....गंभीर विचार-विमर्श तक पूर्ण वैचारिक पवित्रता के साथ पहुँच पाऊंगा ......एक कलमकार के रूप में मुझे ...मेरी रचनाओं को आप सबने जो स्नेह ...आदर दिया वह अमूल्य हो कर स्मृतियों में रहेगा ........आप सभी सम्मानित  मित्रों ..सम्मानित मंच का ह्रदय से आभार ...सादर .....

"शोहरत का मोहताज नहीं हूँ
  खुला हुआं हूँ, राज नहीं  हूँ

 ठेठ अनपढ़ों का लहजा हूँ
पढ़ा- लिखा अंदाज़ नहीं हूँ

जो चाहे  जैसा सुर छेड़े
इतना  आसां साज नहीं हूँ

तीर कहीं पर, कहीं निशाना
ऐसा तीरअंदाज नहीं हूँ

जो सच दिखता है कहता हूँ
सरकारी आवाज़ नहीं हूँ

सच के साथ, अदब रखता हूँ
ज़हरीले अलफ़ाज़ नहीं हूँ

मस्त फकीरों सा, बादल हूँ
बाजों का परवाज़ नहीं हूँ

मै  हूँ जिन्दा अह्साहों में
शाहजहाँ का ताज नहीं हूँ

सुबह-शाम-रातें मै ही हूँ
लम्हों का आगाज़ नहीं हूँ (  आखरी तुकबंदी सम्मानित मंच के सम्मान में )..........

तुमने  मुझको कितना बदला
जो कल था मै ,आज नहीं हूँ ................सादर ...


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