".....हम मुर्ख है ...टीवी के सामने ...आँखे गडाए ...सार्थक बहस /परिणाम की आशा में ...संसदीय कार्यवाही पर गंभीर हो जाते है ...पहले क्या हुआ ...कल क्या हुआ ...कल क्या होगा ...कुछ नहीं ..कुछ भी नहीं ...ये राजनैतिक दलाल ...यंहा -वंहा से ...कुकुरमुत्तो की तरह उठ खड़े होगें ...परस्पर स्वार्थ-सिद्धि के लिए ...और संसदीय आस्थाओं को मारा जायेगा ...बहुमत के नाम पर ...घिन आती है इस तरह की व्यवस्था ...इन जनप्रतिनिधियों को देख कर ...मै इस तरह की संसद ...इस तरह के संसदीय व्यवहार की निंदा करता हूँ ...दंड दो मुझे संसद की आलोचना का ...चाहे तो राष्ट्र-दोह का ...पराजित तो मुझे ही होना है ....फिर किस बात का भय ........"....सम्मानित मंच मन में जो पीड़ा है ....जिस रूप में मुखर हुई आपके सामने धर दिया ...समर्थन/आलोचना का अधिकार आपको सदैव है ....सादर।
"क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है
मक्खियों की भिनभिनाहट
मच्छरों के डंक है
सत्य है सहमा हुआ
झूठ का आतंक है
झूठ ही की है गवाही ,झूठ ही सरपंच है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है
अपनी-अपनी डफलियां है
अपने- अपने राग है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है ............
खादी में खुद को छुपाये
फन उठाये नाग हैं
राजनीति के दलालों ने रचा षड़यंत्र है
क्या ये प्रजातंत्र है,क्या ये प्रजातंत्र है
कौन किसके पक्ष में है
कौन है प्रतिपक्ष में
आज तय होने लगा
कलुषित प्रलोभी कक्ष में
संवैधानिक संस्थाये बन गई एक यंत्र हैं
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है .............
संसदीय आसंदियों पर
मौन है धृतराष्ट्र का
नित नया एक दृश्य है
जनतंत्र पर आघात का
संसदीय आचार अब बन गया प्रपंच है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है ..............
नित यहाँ, मत बेचकर
जन का हुआ अपमान है
ये परस्पर स्वार्थ से
चलता हुआ अभियान है
हैं सभी पापी यहाँ पर ,कौन निष्कलंक है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है ...............
राजनैतिक नीति ,नैतिकता
विभाजित हो रही
संवैधानिक आस्थायें
आज बैठी रो रही
नीति पर अनीति का, राज यह स्वतंत्र है
क्या ये प्रजातंत्र है क्या ये प्रजातंत्र है .................
जाति-मजहब-प्रांत से
ऊपर उठें ,यह देश है
मिल बढ़ें मिल कर लड़ें
यह आज का सन्देश है
इस व्यवस्था में लगी
दीमक को मिल कर मार दें
संवैधानिक आस्थाओं
को पुनः आधार दें
एक स्वर में नीति का उदघोष ही अब मंत्र है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है .....................प्रेमप्रदीप
"क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है
मक्खियों की भिनभिनाहट
मच्छरों के डंक है
सत्य है सहमा हुआ
झूठ का आतंक है
झूठ ही की है गवाही ,झूठ ही सरपंच है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है
अपनी-अपनी डफलियां है
अपने- अपने राग है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है ............
फन उठाये नाग हैं
राजनीति के दलालों ने रचा षड़यंत्र है
क्या ये प्रजातंत्र है,क्या ये प्रजातंत्र है
कौन किसके पक्ष में है
कौन है प्रतिपक्ष में
आज तय होने लगा
कलुषित प्रलोभी कक्ष में
संवैधानिक संस्थाये बन गई एक यंत्र हैं
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है .............
संसदीय आसंदियों पर
मौन है धृतराष्ट्र का
नित नया एक दृश्य है
जनतंत्र पर आघात का
संसदीय आचार अब बन गया प्रपंच है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है ..............
नित यहाँ, मत बेचकर
जन का हुआ अपमान है
ये परस्पर स्वार्थ से
चलता हुआ अभियान है
हैं सभी पापी यहाँ पर ,कौन निष्कलंक है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है ...............
राजनैतिक नीति ,नैतिकता
विभाजित हो रही
संवैधानिक आस्थायें
आज बैठी रो रही
नीति पर अनीति का, राज यह स्वतंत्र है
क्या ये प्रजातंत्र है क्या ये प्रजातंत्र है .................
जाति-मजहब-प्रांत से
ऊपर उठें ,यह देश है
मिल बढ़ें मिल कर लड़ें
यह आज का सन्देश है
इस व्यवस्था में लगी
दीमक को मिल कर मार दें
संवैधानिक आस्थाओं
को पुनः आधार दें
एक स्वर में नीति का उदघोष ही अब मंत्र है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है .....................प्रेमप्रदीप
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