Sunday, December 16, 2012

1)शायद परसों की बात है ...पेरेंट्स-मीटिंग से लौट रहा था ...बच्चों का हुजूम और उनका मस्त-आल्हाद ...मन प्रसन्न हो गया ...लौटते में एक प्रार्थना जोर-जोर से गुनगुनाने लगा ....साथ में गुनगुनाने के लिए अपने बच्चे को भी उत्साहित किया ....कुछ देर बाद अचानक ही वह पूछ बैठा ...प्रार्थनाये हमें क्यूँ करना चाहिए ...इससे क्या होता है ...तात्कालिक रूप से उसकी जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास किया ....फिर ऑफिस -मार्केट ....लेकिन बालमन का वो प्रश्न सक्रिय रहा ...." प्रार्थनायें हमारे विचारों के लिए फ़िल्टर का काम करती है '" शायद मन ने कहा ...फिर फिर विचार करता रहा मन की इस बात पर ...विचार पर विचार ...यकायक चिल्ला उठा ....हाँ सच तो है ...प्रार्थनाएं यही तो करती है ...उस बालमन की सहज जिज्ञासा ने एक नवीन बोध दिया ....मुझे याद दिलाया ..अंतिम बार .कब मैंने कुछ क्षण प्रार्थनाओं के साथ बिताया था ...अंतिम बार कब प्रार्थनाये मेरे भीतर प्रवेश कर रही थी और अश्रुधारा बन मेरे मन के छल-कपट-प्रपंचअहंकार को बाहर बहा दे रही थीं ....मै रो पड़ा अपनी विवशता पर ....

2)  ....प्रार्थनायें  हमें विनम्र विचार देती हैं ...विचार हमें आंदोलित  करते है ....और वह  वैचारिक आंदोलन तात्कालिक आक्रोश भर न हो कर, सार्थक परिणाम की और प्रेरित करता है ......गाँधी ने वही किया था ...गांधी ने आक्रोश को नहीं ..विचारों को आंदोलित किया था ...असत्य को आरोपित नहीं किया था ....सत्य को प्रकाशित किया  था ...बिना किसी प्रतिहिंसा की भावना से अहिंसक शक्ति/सामर्थ्य को स्थापित किया था ....हमने बड़ी जल्दी भुला दिया उस महान विचार को ...अभी भी समय है ...हम पुनः -पुनः लौटे उन विचारों की ओर  ....प्रार्थनाओं की ओर ....यह  हमें ,समाज को विवेकशील जाग्रति देगा ....हमारा नैतिक पतन रुकेगा ...हम आक्रोश की जगह वैचारिक रूप से आंदोलित हो सकेंगे ......सादर ......

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