आज प्रभात सुहात न गोकुल साँझहि श्यामहि संग भली थी
यौवन सून पड़ा तुमरे बिन ,,सोचत क्यूं मन संग चली थी .....कोमल मन की पीड़ा को ...श्याम के वियोग में ...क्या प्रभात ..क्या सांझ ....यौवन का कैसा उत्साह .....आदरणीय शुक्ल जी ....कविता की इस शैली में आपका कोई जवाब नहीं .....तन-मन मुग्ध कर देती है आपकी रचनाएँ ....मन करता है संगम-घाट पर ...त्रिवेणी के लहरों के संग आपसे आ मिलूं ......और कहूँ ...ऐ भईया ...तू सुनावत जा ...हम आँख मूँद सुनत रही .....संभव है उस क्षण ग्वाल-बालगोपाल गोपियों संग स्ययम आपके सम्मुख नृत्य-मुद्रा में उपस्थित हो उठें ...ह्रदय की पूर्ण विनम्रता से नमन करता हूँ ...आपको ...आपकी कलम को ...सादर।।।।
यौवन सून पड़ा तुमरे बिन ,,सोचत क्यूं मन संग चली थी .....कोमल मन की पीड़ा को ...श्याम के वियोग में ...क्या प्रभात ..क्या सांझ ....यौवन का कैसा उत्साह .....आदरणीय शुक्ल जी ....कविता की इस शैली में आपका कोई जवाब नहीं .....तन-मन मुग्ध कर देती है आपकी रचनाएँ ....मन करता है संगम-घाट पर ...त्रिवेणी के लहरों के संग आपसे आ मिलूं ......और कहूँ ...ऐ भईया ...तू सुनावत जा ...हम आँख मूँद सुनत रही .....संभव है उस क्षण ग्वाल-बालगोपाल गोपियों संग स्ययम आपके सम्मुख नृत्य-मुद्रा में उपस्थित हो उठें ...ह्रदय की पूर्ण विनम्रता से नमन करता हूँ ...आपको ...आपकी कलम को ...सादर।।।।
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