'मानवीय इतिहास में कभी -कभी ऐसा क्षण आता है .... जब गहन संवेदनायें भी अर्थहीन मालूम होती है ...शब्द बेमतलब ...शोक थोथला प्रलाप ....आज वही क्षण है ...आज वही क्षण है ...."
इस क्षण को शोक और आक्रोश में व्यर्थ न जाने दें ...विचार करें वह बच्ची आज जिस तरह गई ..उस तरह फिर कभी और न जाने पाये ...यह दृश्य पुनः कभी न सामने आये ....ईश्वर का नहीं पता ...लेकिन इस तरह की घटनायें मनुष्य और मनुष्यता को तो हिला ही जाती हैं ...आज हम सब विचार करें ....फिर कभी दुनिया इतनी बदरंग ...डरावनी न होने पाये ....फिर कोई पैशाचिक मानसिकता हमारे बीच से निकल सर न उठाये ....ईश्वर कुछ नहीं ...कहीं नहीं है ....हम ही हैं ...हमें ही खुद को संभालना ...संवारना होगा ...ईश्वर आज पहली बार मै तुम्हे मानने से इनकार करता हूँ ...तुम्हे पूरी तरह से ख़ारिज़ करता हूँ ...अपनी उपस्थिति प्रमाणित करने का वो दुर्भाग्यपूर्ण क्षण तुमने खो दिया ....तुम नहीं हो कहीं नहीं हो .....................
इस क्षण को शोक और आक्रोश में व्यर्थ न जाने दें ...विचार करें वह बच्ची आज जिस तरह गई ..उस तरह फिर कभी और न जाने पाये ...यह दृश्य पुनः कभी न सामने आये ....ईश्वर का नहीं पता ...लेकिन इस तरह की घटनायें मनुष्य और मनुष्यता को तो हिला ही जाती हैं ...आज हम सब विचार करें ....फिर कभी दुनिया इतनी बदरंग ...डरावनी न होने पाये ....फिर कोई पैशाचिक मानसिकता हमारे बीच से निकल सर न उठाये ....ईश्वर कुछ नहीं ...कहीं नहीं है ....हम ही हैं ...हमें ही खुद को संभालना ...संवारना होगा ...ईश्वर आज पहली बार मै तुम्हे मानने से इनकार करता हूँ ...तुम्हे पूरी तरह से ख़ारिज़ करता हूँ ...अपनी उपस्थिति प्रमाणित करने का वो दुर्भाग्यपूर्ण क्षण तुमने खो दिया ....तुम नहीं हो कहीं नहीं हो .....................
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