Sunday, December 16, 2012

आज का साहित्य और साहित्यकार बहुत अधिक स्वाग्रही बन गया है ....आत्म-मुग्ध हो स्वछंद विचरण करना चाहता है ...गोष्ठियों में सभाओं में ...यत्र -तत्र -सर्वत्र ...अपने बोध को अंतिम सत्य बोध मान ...नकार देना चाहता है ..परस्पर विचारों को ...इस असहज वातावरण में पढना तो कुछ सहज अभी भी है ...किन्तु अभियक्त करना पहले से भी अधिक दुष्कर ....नित नवीन माध्यमों के पश्चात भी वैचारिक संकुचन,क्रिया -प्रतिक्रिया को बाधित कर रहा है ....पढना और गढ़ना ...सिर्फ गढ़ना ..या सिर्फ पढना ....अपनी-अपनी प्रतिभा -सामर्थ्य का विषय है ...कुछ हद तक आलोचना /समीक्षा  का भी ...किन्तु उसके पहले वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में जो दुराव और दुविधा की स्थति है ...उसके साथ कैसे सामंजस्य स्थापित किया जाए .....सम्मानित मंच ...सम्मानित मित्रों। .......और हाँ यह दुराव यह दुविधा साहित्य के  हर स्तर ....हर माध्यम पर है ...सादर।।।।

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