Monday, December 31, 2012

"जो  बीत गया सो बीत गया
 मानव-मन गा  तू गीत नया ...........

हर काल-खंड में तेरा ही सामर्थ्य रहा है
इतिहासों में गौरवशाली संघर्ष रहा है
सृष्टि-सृष्टा के ज्ञात और अज्ञात मौन में
श्रम तेरा ही था ,तेरा ही निष्कर्ष रहा है

तू हारा कब जो जीत गया
मानव-मन गा तू गीत नया ........

तू युगों-युगों के वैभव का संचित स्वर है
तू स्ययम ब्रम्हा ,विष्णु है स्ययम शिवंकर है
इस पावन धरती के कण-कण में तेरा ही तप है
करुना साहस से ओत-तू स्ययम नील-अम्बर है

क्या संचित बल अब रीत गया
मानव-मन गा तू गीत नया .........

भीतर की सारी पीडाओं को आज निगल ले
नव -वर्ष ,हर्ष ,उत्कर्ष भाव को गान प्रबल दे
दिन और तिथि तो मात्र एक जिज्ञासा है
विधि के विधान पर युग  -युग का दुर्भाग्य बदल दे

ले नव-स्वर ,लय ,संगीत नया
मानव-मन गा तू गीत नया .............................................

Sunday, December 30, 2012

मीडिया मतलब माध्यम ....काफी पहले कहीं पढ़ा था ....हमारी ही तरह शब्द भी कितनी तेजी से अपने अर्थ बदलते जा रहे है ...दुःख होता है यह सब देख-सुनकर ....कवि  होने का भ्रम पाले बैठा हूँ ....कविता में ही कहूँगा " मै जानता  हूँ एक दिन निज़ाम बदलेगा
  ये ज़मीं बदलेगी वो आसमान बदलेगा
  हवा बदलेगी और बदलेंगे मौसमी तेवर
  वक़्त की बज़्म में किस्सा तमाम बदलेगा  ............

Saturday, December 29, 2012

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"नव पल्लव - 2013"
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"आज का दिन उस प्रार्थना का दिन है ....आज का दिन विचार करने का दिन है ...आज का दिन ये शपथ उठाने का दिन है कि फिर कभी इस तरह का दिन कहीं न आने पाये ....तो आइये शुद्ध मन से विचार कर शपथ लेतें हैं कि ........
1) मै एक व्यक्ति के रूप में मानवीय संवेदना के साथ "स्त्री " की गरिमा और सम्मान का प्रहरी रहूँगा ...
2)मैं एक सदस्य के रूप में "स्त्री" के सम्मान ,अधिकारों को पारिवारिक सुरक्षा /मान्यता दूंगा ...........
3)मै  एक शिक्षक होने के नाते बालमन को  वो नैतिक वैचारिक आधारशिला दूंगा ...जिस पर चलकर मानवीय गुणों से पूर्ण हो वह स्ययम एवं समाज को सम्मान दें .....
4)मै बतौर अभिभावक तय करूँ मेरा बच्चा पूरी तरह से संस्कारित हो ...वह अपने अधिकारों  के साथ -साथ ,अपने पारिवारिक /सामाजिक  /नागरिक कर्तव्यों के प्रति  भी सजग रहे .........
5)मै आज प्राण करूँ की मेरे पेशे /व्यवसाय /सेवाओं में "स्त्री" विमर्श ..."स्त्री" की उपस्थिति ..."स्त्री "का उपयोग ..."स्त्री"की पूर्ण गरिमा ....और सम्मान के साथ हो ....
6) एक कलाकार होने के नाते मैं तय करूं कि कला के किसी भी माध्यम में "स्त्री " का कलात्मक प्रदर्शन हो ...देह-दर्शन और उत्तेजना से परे ...संवेदनात्मक आधार पर "स्त्री" को चित्रित /प्रस्तुत करूँ ....अपनी कला के माध्यम से "स्त्री "के ओज और स्वाभिमान का वाहक बनू ........
और सबसे अंत में ..............................................................
7)एक युवा के रूप मैंने नित नई भौतिक सफलताएँ अर्जित की हैं ....मुझे और आगे बढ़ना है ....लेकिन इस शपथ के साथ कि मै अपना "आदर्श" चुनने में पहले से अधिक संवेदनशील हो कर ...सामाजिक मूल्यों /,मान्यताओं के बीच स्ययम की गरिमामय उपस्थिति के साथ ...एक नई दिशा  ...नया विचार सृजित करूँ ........

.........................................यह संभव है ...हम सब चाहें तो ऐसा कर सकते हैं ....और यदि ऐसा हो सका तो निश्चित ही सख्त कानूनी प्रावधान / त्वरित न्याय विधान /प्रशासनिक संवेदनशीलता के बीच इस तरह का अमानवीय दृश्य फिर  कभी सामने आ ही ना पाये ....हम पुनः मानव होने का सम्मान प्राप्त कर पायें ......सादर।
नियम भंग न हो ...सिर्फ इस विचार से मन की वेदना  को विस्तार दे रहा हूँ .....आप सम्मानित मित्रों से "काव्यात्मक पंक्तियों " पर  नहीं ...प्रस्तुत विचार पर सहभागिता चाहूँगा ...सविनय .....

"तय करो, न फिर से ये मंज़र दिखे
 तय करो, न जिंदगी ऐसे रुके
 तय करो, न आबरू से खेल हो
 तय करो, न इस तरह अंधेर हो

 तय करो ,अब  वक़्त तय करने का है
 तय करो ,अब वक़्त ये लड़ने का है
 उठ चलो ,मिल कर सभी आवाज दो
 अधजले पंखों को फिर परवाज़ दो

 ये कोई कविता नहीं ,बस एक दुआ है
 फिर कभी न हो, जो बीते कल हुआ है ............................


'मानवीय इतिहास में कभी -कभी ऐसा क्षण आता है .... जब गहन संवेदनायें भी  अर्थहीन मालूम होती है ...शब्द बेमतलब ...शोक थोथला प्रलाप  ....आज वही क्षण है ...आज वही क्षण है ...."
इस क्षण को शोक और आक्रोश में व्यर्थ न जाने दें ...विचार करें वह बच्ची आज जिस तरह गई ..उस तरह फिर कभी और न जाने पाये ...यह दृश्य पुनः कभी न सामने आये ....ईश्वर  का नहीं पता ...लेकिन इस तरह की घटनायें मनुष्य और मनुष्यता को तो हिला  ही जाती हैं ...आज हम सब विचार करें ....फिर कभी दुनिया इतनी बदरंग ...डरावनी न होने पाये ....फिर कोई पैशाचिक मानसिकता हमारे बीच से निकल सर न उठाये ....ईश्वर कुछ नहीं ...कहीं नहीं है ....हम ही हैं ...हमें ही खुद को संभालना ...संवारना होगा ...ईश्वर आज पहली बार मै तुम्हे मानने से इनकार करता हूँ ...तुम्हे पूरी तरह से ख़ारिज़ करता हूँ ...अपनी उपस्थिति प्रमाणित करने का वो दुर्भाग्यपूर्ण  क्षण तुमने खो दिया ....तुम नहीं हो कहीं नहीं हो .....................

Friday, December 28, 2012

लदा फदा इसको जब देखा
सजे घोंसले यहाँ वहाँ
छाँव बटोही ने पायी पर
विष्ठा विसर्जन भेंट किया
नोच किसी ने पत्ते टहनी
सोचो कितना तडपाया होगा
याद किया जो लुटना पल छिन
जर्जर वटवृक्ष रोये सिसके............सृष्टा द्वारा रचित सृष्टि .......मानव ......सृष्टि नियमबद्ध .....मानव स्वार्थ बद्ध ....सृष्टि ने  ...नदी-पहाड़ों ,जंगल झरनों ,धूप -वृक्ष ...एक-एक कण को अपने स्नेह से सिंचित किया .....मानव ने सृष्टि के कण -कण को निज स्वार्थ से दंशित किया ....सृष्टि अभी तक मौन है .....क्यूंकि ...उसकी पीड़ा को समझने -गाने वाला कविमन उसकी पीड़ा को अपनी वाणी दे रहा है ...और बखूबी दे रहा है .....आदरणीय नवल जी जिस गहन संवेदना के साथ आपने इस पीड़ा को काव्यरूप में ढाला ....मन को छू गया ....
अंबर सा आँचल इस पर भी
होगा कभी तो तना हुआ
पोषित हो उर्वर प्रकृति से
हरा भरा मुस्काया होगा ............एक चित्र खींचती हुई पंक्तियाँ ...न जगाती  है ....न हिलाती ...बस जडवत कर ....आँखों से अश्रु बूँद बह आती है ....और वह अश्रु-बूँद ही इस मर्मस्पर्शी रचना का पुरुष्कार है .......सादर नमन करता हूँ रचना को ...आपको ....सादर ......
" दिल्ली की इस दुर्घटना के बाद ...कई तस्वीरें सामने आई ....जन -मन  के आक्रोश की ...राजनैतिक अफ़सोस की ...दिल्ली पुलिस के पुलिसिया जोश की ....इन तस्वीरों ने जवाब माँगा ...तो कुछ सवाल भी खड़े किये ..

Thursday, December 27, 2012


आदरणीय नवल जी ....ह्रदय की पूर्ण श्रद्धा से आपको सादर नमन ...आपने मेरी रचनाओ की अनुपस्थिति को उतनी ही गभीरता से लिया ....ये मेरे लिये व्यतिगत तौर पर बड़े सम्मान की बात  है ....आपका स्नेह ही है जो हम  सब मित्रों को आपके सम्मुख नतमस्तक कर देता है ....सत्य मानियेगा ....अपनी रचनाओं के साथ मंच पर न पहुँच पाने का मुझे भी दुःख है ....किन्तु मेरे व्यतिगत प्रयास <रचनाये > समयाभाव और साधनहीनता की वजह से , मुझे अन्य  सम्मानित  मित्रों की रचनाओं ....एवं मंचीय गतिविधियों में सक्रीय भूमिका निभाने में बाधित कर रही थी .....!1 घंटे का समय ...नेट की विवशता .....स्व-रचना पर  आई प्रतिक्रियाओं का लोभ .....यही सब कारण थे  मेरे उस निर्णय के पीछे .....मुझे पूर्ण विश्वास  है आप मेरी भावनाओ को भली-भांति समझ जाते है ......इस निर्णय पर भी मुझे  आशीर्वाद दीजिये ......हाँ जिस दिन "नेट कैफे "की बाध्यता से मुक्त जाऊँगा ....दिल खोल कर गाऊंगा /गुनगुनाऊंगा ...विचारों को नवीन आग्रह से स्वीकार करने का बोध आपसे ही मिला ....इसलिए आप मेरे लिए गुरुतुल्य है ....आपके आदेश की अवज्ञा कर रहा हूँ ...क्षमा कीजिएगा ............
"दुःख मानव  की नियति नहीं है
 सुख भी अंतिम सत्य नहीं
 जीवन के इस महामंच पर
 होता है   नैपथ्य नहीं

 मीलों  तक  चलते जाना हो
 तो एक क्षण अवकाश जरुरी ........यह अवकाश मात्र है ...आप आशीर्वाद दीजिये की मेरे हालात कुछ बेहतर हो और मै अधिक से अधिक समय आपके स्नेह और सम्मानित मंच पर बिता सकूँ .....बतौर रचनाकार ...बतौर पाठक .....सादर ......

Monday, December 24, 2012

निश्चित ही अब जरुरत है और अधिक सख्त क़ानून की ,,,त्वरित न्याय की ....अब ये हो ही जाना  चाहिए ....हम सब यही चाहते है ....हम  सब "सही" चाहते हैं ...........लेकिन इसके साथ  ही हमें थोडा ठहर कर ....शांति से विचार करना होगा ...क्या सिर्फ कानून बदल देने से सब कुछ बदल जायेगा ...क्या फिर कोई "राक्षस"सिर नहीं उठाएगा ....कानूनी प्रावधान "रोग का निदान है ".....स्वस्थ होने की गारंटी नहीं ...पूर्णतः स्वस्थ एवं सुरक्षित रहने के लिए कानूनी प्रावधानों के साथ -साथ हमें भी बदलना होगा ...समाज में भी बदलाव  लाना होगा ....
1.अधकचरी आधुनिकता की चकाचौंध में खंडित -मंडित अवशेषों को हम अपना  आदर्श मान बैठे ....सिनेमाई संस्कृति को जीवन का सच ...अन्धानुकरण में हमने  खुद को पूरी तरह बदल डाला .....जो "सेक्सी " शब्द किसी महिला केलिए गाली की तरह होता था .....उस "सेक्सी लुक " के लिए हमने अपनी पहचान बदली ...परिधान बदला ....और तो और पूरी जीवन शैली ही बदल डाली ...हमारे  दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुयें विज्ञापन तय करने लगे ....और बाज़ार ने "स्त्री " को भी वस्तु बना दिया .....हम पढ़े लिखे हैं ....सभ्य भी है ..लेकिन क्या हमारे समाज  का हर तबका ....हर व्यक्ति भी उतना ही शिक्षित ...सभ्य .....
2."स्त्री विचार है ...वस्तु नहीं "
 ...क्या यह  भी  सख्त कानूनी प्रावधान हमें बताएँगे ....? या हमें ही तय करना होगा की चित्र हो ,चलचित्र हो ...घर हो बाहर हो ...विचारों में हो या प्रदर्शनों में हो ..."स्त्री " जहाँ भी हो अपने पूर्ण सम्मान ....गरिमा के साथ हो ...जो भी उसके सम्मान  ,गरिमा के साथ खिलवाड़ करे ...हम सब मिल , उसे प्रताड़ित करें ..फिर वो चाहे सरकार हो ....बाज़ार हो ...अशोभनीय प्रचार-प्रसार हो ...या घटिया सिनेमा की मार हो ......हम सबके द्वारा उन सभी माध्यमों का बहिष्कार हो .....और इसके लिए सबसे पहले "स्त्री" को आगे आना होगा .....और उसे कहना होगा ..."सावधान मै  सृष्टि की सबसे अनमोल रचना हूँ ...सबसे सर्वश्रेष्ठ विचार ....तुम मुझे भोग मत समझो ....मै  स्ययम को वस्तु  नहीं बनने  दूँगी "....स्त्री की इस हुंकार से दृश्य बदलेगा ...परिदृश्य बदलेगा ....समाज बदलेगा ......फिर कानूनी बदलावों की संभवतः आवश्यकता ही न रह जाये .......सादर .....

वहशीपन के खेल ये तेरे अंगना आम
सारे जग की गालियाँ दिल्ली तेरे नाम .........गहन संवेदनात्मक स्तर पर जा कर पीड़ा को उसी तीव्रता के साथ अभिव्यक्त किया आपने ....आदरणीय पंकज जी .....निसंदेह कविता ने अपने सरोकारों को बखूबी गाया .........प्रतिक्रिया के साथ ही एक विचार जोड़ रहा हूँ ....
" 1)कल मै परेशान था ...शांति के लिए तालाब किनारे पार्क में जा बैठा ....अपनी एक अधूरी कविता को पुनः-पुनः गुनगुनाने की कोशिश कर रहा था ....की जो देखा उसने उद्वेलित कर दिया ...अपनी आँखों के सामने 2 यौन-अपराध होते हुए देखा ....किसी का कोई भय नहीं ...कोई आशंका नहीं ...दोनों तरफ युगल प्रेमी मर्यादाओं को ताक पर रख पशुवत व्यवहार कर रहे थे ...जानना चाहेंगे उनकी आयु ... महिला की आयु लगभग 16-17 वर्ष ...पुरुष 20 -21 वर्ष ......मित्रों यह सामाजिक ,नैतिक अवहेलना नहीं ...वरन यौन अपराध था ...नाबालिग की सहमति से किया गया यौनाचार भी यौन-अपराध की श्रेणी में आता है ....यह कानूनी प्रावधान है ...और इस कानून की अवहेलना आज हम सरेराह ..सरेआम पार्को में देखते है ...शर्म से मुँहफेर लेते है ...या गुस्से के साथ कही और निकल जाते है ....कोई और विकल्प है हमारे पास .................?

2) आज हम उत्तेजित है ...आंदोलित है ...हम सख्त कानूनों की मांग कर रहे है ...लेकिन हममे से कितने लोग है जिन्होंने स्ययम स्थापित क़ानूनी प्रावधानों को समझा है ...सम्मान देने का प्रयास किया किया ...कानून सम्मत नागरिक अधिकारों /कर्तव्यों को जिया है ....हम हवा की रफ़्तार से गाडी चलाते है ...हम स्वछन्द ,असंयमित व्यवहार करते है ...जरा -जरा सी बात पर कुत्ते -बिल्लियों सा लड़-झगड़ पड़ते हैं ...दरअसल हम सब छोटे-छोटे अपराधी है ...जिनके अपराध छोटी -छोटी दफाओं के तहत आते है ....और आज हम सब मिलकर सख्त कानून की बात कर रहे हैं .....कानून अपनी सख्ती से नहीं वरन अपने प्रति सम्मान के भाव से अधिक असरकारक होता है ...वह सम्मान भाव हमें अपने भीतर पैदा करना होगा ...हमें पूर्ण नागरिक अधिकारों के साथ ...सम्पूर्ण नागरिक /नैतिक कर्तव्यों के साथ जीने की आदत डालनी होगी .....तभी -तभी ...कानून अधिक असरकारक होगा और हमारे भीतर का अपराधी ,हमारे आस-पास के आपराधिक तत्व भयभीत .......सादर .........................
वहशीपन के खेल ये तेरे अंगना आम
सारे जग की गालियाँ दिल्ली तेरे नाम .........गहन संवेदनात्मक स्तर पर जा कर पीड़ा को उसी तीव्रता के साथ अभिव्यक्त किया आपने ....आदरणीय पंकज जी .....निसंदेह कविता ने अपने सरोकारों को बखूबी गाया .........प्रतिक्रिया के साथ ही एक विचार जोड़ रहा हूँ ....

Monday, December 17, 2012

सम्मानित मंच ...आदरणीय सपन सर ....सादर प्रणाम ....जितना भी और जैसे भी संभव हो सका ...इस गंभीर साहित्यिक वार्ता से जुड़ा रहा ...सभी  सम्मानित मित्रों ने गंभीर विचारों के साथ इस चर्चा को गति दी ...विस्तार दिया ....और उन सभी विचारों के साथ आदरणीय सपन सर ने इस वार्ता को जिस स्तर तक पहुँचाया ....क्या वह छोटी सफलता है ....तत्काल परिणाम की अपेक्षा स्वाभाविक नहीं ....न ही किसी सर्वमान्य निष्कर्ष तक पहुँच पाना इतना सहज ...लेकिन ..लेकिन  ....जब विचार स्थापित होता है तब परिणाम और  निष्कर्ष की सम्भावनाये प्रबल हो उठती है ....और इस गंभीर चर्चा से उस सम्भावना को बल मिला है ...मै इसे इस सम्मानित मंच की बहुत बड़ी सफलता मानूंगा ....मै ह्रदय से बधाई देना चाहूँगा ...इस वार्ता में उपश्थित एक-एक विचार को ....धन्यवाद कहना चाहूँगा इस इस निस्वार्थ साहित्य -सेवा के लिए समर्पित आप वरिष्ठ जनों को ....आपने जो अलख जगाई है ...उसका प्रकाश यही तक सीमित रहने वाला नहीं ....फैलेगा ..चहुँ और फैलेगा .....आदरणीय सपन सर ...मन की पूर्ण श्रद्धा से आपके इस गंभीर प्रयास के लिए नमन करता हूँ ...शत-शत नमन ...सादर।।।

Sunday, December 16, 2012

आदरणीय सपन सर ...सम्मानित मंच  ...अब उठाना होगा ...50 रूपये जेब में है ...3 घंटे का 45 रुपया हो चूका है ...और बैठा मार कर भगायेगा कैफे इंचार्ज ...हा हा हा हा हा .....इस सार्थक चर्चा का अंग बनकर ...आदरणीय सपन सर का विनम्र नेत्रित्व  इस चर्चा को परिणाम तक पहुचाये इन्ही शुभ कामनाओं के साथ  .....आप सभी को सादर प्रणाम ....
आदरणीय सपन सर ....जीवन में अक्सर ऐसा होता हैं न ...हम बड़ी -बड़ी समस्याओं के बड़े-बड़े हल ढूढने की कोशिश करते है ....और असफल हो जाते है ....क्यूंकि हम समस्या के मूल का नहीं ....समस्या के बाह्य स्वरुप का आकलन कर रहे होते है ..मूल में जाने पर पाते है ...समस्या बड़ी सही ....हल तो बहुत मामूली था ..सादर।।।
" कल की वो सहमी सी लड़की ,आज लापरवाह सी
   जुगनुओं को रौशनी का,ये पता किसने दिया .......आदरणीय दीपिका जी ...आप महिला मित्रों की इस आधुनिक मंच पर सक्रियता .....और गंभीर उपस्थिति ....साथ ही गंभीर गहन सृजन ....को देख कर ही कभी मन से निकला था ...आप महिला होने के गुण दोषों के कारण यहाँ नहीं है ...आप अपनी सार्थकता //अपने सामर्थ्य के कारण यहाँ है ... इसका आदर होना चाहिए ....और है भी ....बस आज इतना ही ...पुनः विषय पर लौटते हैं .....सादर ..........
आदरणीय नील जी ....सादर प्रणाम ..मुझे याद है शायद लगभग 2 माह पूर्व मैंने आपकी प्रथम रचना पढ़ी थी .....क्या गजब आकर्षण था ...आमंत्रण था उस रचना में ....प्रफुल्लित मन से प्रतिक्रिया भी दी थी ...उसके पश्चात अन्य रचनायें भी पढ़ी ..अपने आंशिक गुण -दोषों के साथ सभी में एक कविता थी ....लेकिन क्षमा चाहूँगा ...आज सिर्फ कविता गायब है ....बाकी सब है ...मुझे लगता है ...रचना के चुनाव में आपसे त्रुटी हुई है ...अन्यथा आप जिस प्रतिभा के साथ पूर्व में आते रहे है ...वह आज और निखर कर सामने आती ....सादर ..आज आपने थोडा निराश किया ....लेकिन आपके अन्दर वह आग्रह है जो कल फिर हम सब मित्रों को चौका देगा ....सादर।.
आज का साहित्य और साहित्यकार बहुत अधिक स्वाग्रही बन गया है ....आत्म-मुग्ध हो स्वछंद विचरण करना चाहता है ...गोष्ठियों में सभाओं में ...यत्र -तत्र -सर्वत्र ...अपने बोध को अंतिम सत्य बोध मान ...नकार देना चाहता है ..परस्पर विचारों को ...इस असहज वातावरण में पढना तो कुछ सहज अभी भी है ...किन्तु अभियक्त करना पहले से भी अधिक दुष्कर ....नित नवीन माध्यमों के पश्चात भी वैचारिक संकुचन,क्रिया -प्रतिक्रिया को बाधित कर रहा है ....पढना और गढ़ना ...सिर्फ गढ़ना ..या सिर्फ पढना ....अपनी-अपनी प्रतिभा -सामर्थ्य का विषय है ...कुछ हद तक आलोचना /समीक्षा  का भी ...किन्तु उसके पहले वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में जो दुराव और दुविधा की स्थति है ...उसके साथ कैसे सामंजस्य स्थापित किया जाए .....सम्मानित मंच ...सम्मानित मित्रों। .......और हाँ यह दुराव यह दुविधा साहित्य के  हर स्तर ....हर माध्यम पर है ...सादर।।।।
1)शायद परसों की बात है ...पेरेंट्स-मीटिंग से लौट रहा था ...बच्चों का हुजूम और उनका मस्त-आल्हाद ...मन प्रसन्न हो गया ...लौटते में एक प्रार्थना जोर-जोर से गुनगुनाने लगा ....साथ में गुनगुनाने के लिए अपने बच्चे को भी उत्साहित किया ....कुछ देर बाद अचानक ही वह पूछ बैठा ...प्रार्थनाये हमें क्यूँ करना चाहिए ...इससे क्या होता है ...तात्कालिक रूप से उसकी जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास किया ....फिर ऑफिस -मार्केट ....लेकिन बालमन का वो प्रश्न सक्रिय रहा ...." प्रार्थनायें हमारे विचारों के लिए फ़िल्टर का काम करती है '" शायद मन ने कहा ...फिर फिर विचार करता रहा मन की इस बात पर ...विचार पर विचार ...यकायक चिल्ला उठा ....हाँ सच तो है ...प्रार्थनाएं यही तो करती है ...उस बालमन की सहज जिज्ञासा ने एक नवीन बोध दिया ....मुझे याद दिलाया ..अंतिम बार .कब मैंने कुछ क्षण प्रार्थनाओं के साथ बिताया था ...अंतिम बार कब प्रार्थनाये मेरे भीतर प्रवेश कर रही थी और अश्रुधारा बन मेरे मन के छल-कपट-प्रपंचअहंकार को बाहर बहा दे रही थीं ....मै रो पड़ा अपनी विवशता पर ....

2)  ....प्रार्थनायें  हमें विनम्र विचार देती हैं ...विचार हमें आंदोलित  करते है ....और वह  वैचारिक आंदोलन तात्कालिक आक्रोश भर न हो कर, सार्थक परिणाम की और प्रेरित करता है ......गाँधी ने वही किया था ...गांधी ने आक्रोश को नहीं ..विचारों को आंदोलित किया था ...असत्य को आरोपित नहीं किया था ....सत्य को प्रकाशित किया  था ...बिना किसी प्रतिहिंसा की भावना से अहिंसक शक्ति/सामर्थ्य को स्थापित किया था ....हमने बड़ी जल्दी भुला दिया उस महान विचार को ...अभी भी समय है ...हम पुनः -पुनः लौटे उन विचारों की ओर  ....प्रार्थनाओं की ओर ....यह  हमें ,समाज को विवेकशील जाग्रति देगा ....हमारा नैतिक पतन रुकेगा ...हम आक्रोश की जगह वैचारिक रूप से आंदोलित हो सकेंगे ......सादर ......

Thursday, December 13, 2012

आज प्रभात सुहात न गोकुल साँझहि श्यामहि संग भली थी 
यौवन सून पड़ा तुमरे बिन ,,सोचत क्यूं मन संग चली थी .....कोमल मन की पीड़ा को ...श्याम के वियोग में ...क्या प्रभात ..क्या सांझ ....यौवन का कैसा उत्साह .....आदरणीय शुक्ल जी ....कविता की इस  शैली में आपका कोई जवाब नहीं .....तन-मन मुग्ध कर देती है आपकी रचनाएँ ....मन करता है संगम-घाट  पर ...त्रिवेणी के लहरों के संग आपसे आ मिलूं ......और कहूँ ...ऐ भईया ...तू सुनावत जा ...हम आँख मूँद सुनत रही .....संभव है उस क्षण ग्वाल-बालगोपाल गोपियों संग स्ययम आपके सम्मुख नृत्य-मुद्रा में उपस्थित हो उठें ...ह्रदय की पूर्ण विनम्रता से  नमन करता हूँ ...आपको ...आपकी कलम को ...सादर।।।।

Tuesday, December 11, 2012

....उस दिन रू-ब -के दरमियाँ एक जिज्ञासा ज़ाहिर की  किया ...लेकिन दुर्भाग्य-वश आज के आधूनिक संवेदनाओं में वैचारिक पीड़ा को भी  व्यतिगत मान लिया जाता है ...."व्यक्ति से विचार" बन जाने का वो आग्रह कई घंटों तक परेशान  करता रहा ...सोचता रहा यह किस तरह संभव है ..."अचानक याद हो आई ....बापू  से हुई मुलाकात  ....मैंने पूछा था उनसे ...आप गांधी से विचार कैसे बने ....वो हंस दिए "सत्य ,अहिसा ,अपरिग्रह ,आत्मिक उत्थान ....यह सब कुछ मुझसे पहले भी था ...बस मैंने इतना भर किया की इन विचारों /सिद्धांतो के आह्वान के पहले "स्व " को शांत किया ...स्व को शांत करते ही मेरी व्यतिगत आवश्यकताएं ,महत्वाकांक्षाये यहाँ तक की मै स्ययम भी अर्थहीन हो गया ..स्ययम का नहो कर सबका हो जाना ही तो "विचार "है ......वो पुनः हंस दिये " मैंने पुनः प्रश्न किया बापू विचार बन पाना क्या इतना ही सहज है ....बापू गंभीर हो गए ..पूछा "क्या-क्या है तुम्हारे पास ...जो भी था मैंने उन्हें बताया ...उन्होंने कहा सबको स्वाहा कर दो ...मैंने कर दिया ...उन्होंने कहा क्या और कैसा दीखता है ...मैंने कहा आप दिख रहें है ....मैं  दिख रहा हूँ ...आस-पास सब  कुछ दिख रहा है ..वो पुनः मुस्कुराये "अब अपने इस मै को बाहर खींच स्वाहा  कर ...किया ....और अचानक एक ही क्षण में सब कुछ बदल गया ...ना मै ...ना गांधी ... न कुछ अन्य ....था तो बस विचार ...सम्पूर्ण दृश्य ...सम्पूर्ण चल-अचल ...सम्पूर्ण सृष्टि ...मात्र विचार ....."भले ही यह वार्ता अवचेतन में घटी हो ....लेकिन व्यक्ति से विचार बन पाना है महत्त्वपूर्ण ... अब मै  इसी महत्त्व के साथ इस सम्मानित मंच पर विचरना चाहता हूँ ...सुन्दर -सुन्दर रचनाओ के माध्यम से सुन्दर -सुन्दर विचारों को ग्रहण करना चाहता हूँ ....वैचारिक तटस्थता के साथ इस सम्मानित मंच पर आना चाहता हूँ और यह तभी संभव है जब मै स्ययम के ...स्ययम के सृजन के स्वाभाविक मोह से बाहर आऊँ  ...मन की निश्छलता के साथ अपने भीतर के "मै और मेरा " को विश्राम दूँ .....एक रचनाकार के रूप में मंच पर यह मेरी अंतिम प्रस्तुति है .....लेकिन एक विचार रूप में अब मै  और अधिक सक्रियता के साथ इस सम्मानित मंच पर .....सुन्दर रचनाओं तक ....गंभीर विचार-विमर्श तक पूर्ण वैचारिक पवित्रता के साथ पहुँच पाऊंगा ......एक कलमकार के रूप में मुझे ...मेरी रचनाओं को आप सबने जो स्नेह ...आदर दिया वह अमूल्य हो कर स्मृतियों में रहेगा ........आप सभी सम्मानित  मित्रों ..सम्मानित मंच का ह्रदय से आभार ...सादर .....

"शोहरत का मोहताज नहीं हूँ
  खुला हुआं हूँ, राज नहीं  हूँ

 ठेठ अनपढ़ों का लहजा हूँ
पढ़ा- लिखा अंदाज़ नहीं हूँ

जो चाहे  जैसा सुर छेड़े
इतना  आसां साज नहीं हूँ

तीर कहीं पर, कहीं निशाना
ऐसा तीरअंदाज नहीं हूँ

जो सच दिखता है कहता हूँ
सरकारी आवाज़ नहीं हूँ

सच के साथ, अदब रखता हूँ
ज़हरीले अलफ़ाज़ नहीं हूँ

मस्त फकीरों सा, बादल हूँ
बाजों का परवाज़ नहीं हूँ

मै  हूँ जिन्दा अह्साहों में
शाहजहाँ का ताज नहीं हूँ

सुबह-शाम-रातें मै ही हूँ
लम्हों का आगाज़ नहीं हूँ (  आखरी तुकबंदी सम्मानित मंच के सम्मान में )..........

तुमने  मुझको कितना बदला
जो कल था मै ,आज नहीं हूँ ................सादर ...


आदरणीय राज जी ....जो छोटी सी त्रुटी आज आपसे हुई ...वह मै  भी कर चूका हूँ पूर्व में ...अपने -आप को सही मान बहस करता रहा लेकिन जब शांत हो कर विचार किया ...मंच के नियमों ...दैनिक आयोजनों को निकट से समझा तो स्ययम से शर्मिंदा हुआ ....मंच के नियम ...मंच की गतिविधियाँ ....मंच का वातावरण सब कुछ ...सुन्दर ...व्यवस्थित ...सम्मानजनक है ....यहाँ -आना और जाना बहुत आसान है ...कोई बंधन नहीं /कोई बाध्यता नहीं .....लेकिन जायेंगे कहाँ ...क्या इससे सुन्दर व्यवस्थापन ....संचालन ....गतिविधियाँ अन्यत्र कहीं है .....और सबसे बड़ी बात परस्पर सम्मान का भाव रचनाओं के प्रति ...रचनाकारों के प्रति ....तो मेरा व्यतिगत आग्रह है आपसे ....यहाँ से  जाने की बात न करे ...अपने मन के भावों को गायें  -गुनगुनायें ....स्ययम हँसे -सबको हंसाएं ...फिर देखिएगा कितना आनंद आएगा ....मन  की विनम्रता से कहता हूँ हूँ ....आप एक बार शांत मन से विचार करें ....सब सुन्दर हो जायेगा .....सादर ......

Sunday, December 9, 2012

 सिर्फ आयु के आधार पे किसी को वरिष्ट कहना काव्य परंपरा में गलत लगता है ....बेशक़ ....आपने बहुत सही बात कही ....वरिष्ठता का आकलन अनुभव के आधार पर होना चाहिए ....ना कि आयु के ....मै इससे थोडा आगे बढ़कर कहता हूँ ....आप-आप नहीं है ....मैं -मैं नहीं हूँ ...कोई कुछ भी नहीं है ...है तो सिर्फ विचार ...कोई विचार आपको आंदोलित कर बाध्य करता है शब्द-रूप देने के लिए ...कोई विचार मुझे ....तो इस तरह महत्त्वपूर्ण क्या है .....सिर्फ और सिर्फ विचार ...लेकिन आज के आधुनिक साहित्य समाज में हो क्या रहा है ...परस्पर लेन -देन  की बनियागीरी ....नाम और पहचान के साथ रचनाओं /साहित्य तक पहुँचने की जुगलबंदी ....और ये कर कौन रहा है ....कोई पाठक नहीं ....कोई श्रोता नहीं ....सिर्फ हम और हमारा अहम् ....इस स्वार्थ के कारण न जाने कितनी ही सुन्दर /गहरी रचनाये ...अनदेखी हो जाती हैं ....कितने ही   सक्षम नवोदित कलमकार ...स्ययम के सृजन पर आशंकित .....आत्मा से कहता हूँ ...ये पाप है ...जो साहित्य के नाम पर हम-आप ही कर रहें है ...आप युवा है जानना चाहता हूँ आपसे ....एक विचार है ....."क्यूँ न हर साहित्यिक मंच से नाम-पहचान हटा दी जाए ...चेहरें हटा दिए जाएँ ...विचार हों सिर्फ विचार ....विचारों के आधार पर ही ...उसकी सार्थकता /उसकी गराई /साहित्यिक -असाहित्यिक पहुँच की सराहना -आलोचना की जाए ..."...क्या ये संभव है ...और क्या इस विचार के समर्थन में आप आगे आना चाहेंगें .....मेरा यही प्रश्न है ...।

Friday, December 7, 2012

".....हम मुर्ख है ...टीवी के सामने ...आँखे गडाए ...सार्थक बहस /परिणाम की आशा में ...संसदीय कार्यवाही पर गंभीर  हो जाते है ...पहले क्या हुआ ...कल क्या हुआ ...कल क्या होगा ...कुछ नहीं ..कुछ भी नहीं ...ये राजनैतिक दलाल ...यंहा -वंहा से ...कुकुरमुत्तो की तरह उठ खड़े होगें ...परस्पर स्वार्थ-सिद्धि के लिए ...और संसदीय आस्थाओं को मारा जायेगा ...बहुमत के नाम पर ...घिन आती है इस तरह की व्यवस्था ...इन जनप्रतिनिधियों को देख  कर ...मै  इस तरह की संसद ...इस तरह के संसदीय व्यवहार की निंदा करता हूँ ...दंड दो मुझे संसद की आलोचना का ...चाहे  तो राष्ट्र-दोह का ...पराजित तो मुझे ही होना है ....फिर किस बात का भय ........"....सम्मानित मंच मन में जो पीड़ा है ....जिस रूप में मुखर हुई आपके सामने धर दिया ...समर्थन/आलोचना का अधिकार आपको सदैव है ....सादर।


"क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है

मक्खियों की भिनभिनाहट
 मच्छरों के डंक है
 सत्य है सहमा हुआ
झूठ का आतंक है

झूठ ही की है गवाही ,झूठ ही सरपंच है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है

अपनी-अपनी डफलियां है
 अपने-  अपने राग है
 क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है ............

खादी में खुद को छुपाये
फन उठाये  नाग हैं

राजनीति के दलालों ने रचा षड़यंत्र है
क्या ये प्रजातंत्र है,क्या ये प्रजातंत्र है


कौन किसके पक्ष में है
कौन है प्रतिपक्ष में
आज तय होने लगा
कलुषित प्रलोभी कक्ष में


संवैधानिक संस्थाये बन गई एक यंत्र हैं
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है .............

संसदीय आसंदियों पर
 मौन है धृतराष्ट्र का
नित नया एक दृश्य है
 जनतंत्र पर आघात का

संसदीय आचार अब बन गया प्रपंच है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है ..............

नित यहाँ, मत बेचकर
जन  का हुआ अपमान है
ये  परस्पर स्वार्थ  से
चलता हुआ अभियान है

हैं सभी पापी यहाँ पर ,कौन  निष्कलंक है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है ...............


राजनैतिक नीति ,नैतिकता
 विभाजित हो रही
संवैधानिक आस्थायें
आज बैठी रो रही


नीति पर अनीति का, राज यह स्वतंत्र है
क्या ये प्रजातंत्र है क्या ये प्रजातंत्र है .................

जाति-मजहब-प्रांत से

ऊपर उठें ,यह देश है
मिल बढ़ें  मिल कर लड़ें
यह आज का सन्देश है
इस व्यवस्था में लगी
दीमक को मिल कर मार दें
संवैधानिक आस्थाओं
को पुनः आधार दें

एक स्वर में नीति का उदघोष ही अब मंत्र है
क्या ये प्रजातंत्र है ,क्या ये प्रजातंत्र है .....................प्रेमप्रदीप










Sunday, December 2, 2012

आदरणीय नवल जी ....यह मंच आपके लिए साधना स्थल की तरह है .....यंहा किसी भी तरह व्यवधान ...विकृति ....आपको भावनात्मक रूप से आहत ...वैचारिक रूप से आक्रोशित करेगी। मै  आपकी पीड़ा को समझ भर सकता हूँ ...उसकी गहनता का अंदाजा लगा पाना मेरे बस की बात नहीं।......... आप  वरिष्ठ सम्मानित मित्रों ने उपस्थित हो कर मेरी रचना को जो मान ...अवं मुझे जो उर्जा दी ,वह मेरी स्मृतियों में स्पंदित होता रहेगा ....जो उपस्थित नहीं हो सके ...संभव है उनकी कोई विवशता रही होगी ....दैनिक ,पेशागत ,वैचारिक, व्यतिगत ...अब जो है ही नहीं उनके लिए क्या जी जलाना ....मै व्यतिगत रूप से वचनबद्ध हूँ की जब तक भी इस मंच रहूँगा मेरे लिए प्रस्तुत सृजन ,प्रस्तुत रचनायें ही अपने गुण-दोषों के साथ महत्त्वपूर्ण होगीं ....सृजन किसका है ...रचनाकार कौन है ....ये नहीं ....कभी नहीं। .....सादर .....

Saturday, September 8, 2012

आदरणीय नवल जी .....सविनय धन्यवाद सहित ....आभार आपके द्वारा की गई समीक्षा इतनी सटीक ,सार्थक होती है कि ....खुद की ही रचना को पुनः पढने ....पुनः गढ़ने की छह हो उठती है ...निश्चित ही इस रचना में वो कमियां रह गई जो परस्पर पंक्तियों को आबद्ध कर स्ययम को 

Friday, September 7, 2012

"पिछले कुछ दिनों से ख़याल आ रहे थे मगर एक  मुकाम तक पहुँचने से दूर थे ......कल रात ख़याल मुकम्मल हो सके .......इस मंच के सभी वरिष्ठ एवं  सम्मानित मित्रों से प्रशंसा /आलोचना रुपी आशीर्वाद चाहूँगा .........."

....................बस यूँ ही ....................

तुझको भुलाना चाहा ,खुद को भुला दिया
मुझको मेरी वफाओं ने कैसा सिला दिया

हम तो चले थे ढूडने हम जैसा आदमी
राहों की ठोकरों ने खुदा से मिला दिया

साक़ी की बेरुखी का ये अंदाज देखिये
पीना था हमें और क्या उसने पिला दिया

अपने लहू से हमने चमन को बहार दी
शाखों की साजिशों ने गुलो को जला दिया

अखबार की कतरन में भूख से हुई मौतें
दिल्ली न सही ,दिल को ख़बर ने हिला दिया

जैसी भी रही खूब रही तेरा शुक्रिया
हर रंग-ओ-बू से याखुदा तूने  मिला दिया

तुझको भुलाना चाहा  खुद को भुला दिया  ................सविनय ....

Tuesday, September 4, 2012

उनवान ***ईश्वर/भगवान/परमात्मा/ईश/प्रभु/परमेश्वर/परमेश/मालिक/खुदा/अल्लाह/खुदाबंद/रब*** पर रचना..

जीवन के आपातकाल में ..जब हारने के लिए कुछ नहीं बचा था ..और जीतने लिए कोई उम्मीद नहीं ...तब अंतर्मन से कुछ आवाजें आती थी ...वो कौन था ...मेरा अंतर्मन या कोई और ....'क्या परमात्मा "....हाँ शायद ............
आ निराशा घेर मुझको ,भेद दे मेरा ह्रदय

अंश मन में शेष है ,आशा का दे उसको मिटा
प्राण तन में न रहे, दे इस तरह मुझको हिला
स्वप्न सरे तोड़ कर नैनों में काटें दे चुभो
छोड़ दे मुझको तिमिर में, सूर्य दे मेरा डुबो

मन में है जो द्वन्द ,उसमे मच रहा कैसा प्रलय
आ निराशा घेर मुझको ,भेद दे मेरा ह्रदय .....

        कौन  है जो श्वास में विश्वास को है सींचता
        कौन है जो काल की बांहों से मुझको खीचता
        कौन है जो दूर ही से रौशनी  दिखला रहा
        कौन है जो उच्च स्वर में गीत जय के गा रहा

 कौन कहता है लड़ो संघर्ष से होती विजय
आ निराशा घेर मुझको भेद  दे मेरा ह्रदय .....

कौन कहता है निराशा ,हार का प्रारंभ है
मात्र आशावादियों का यह अनर्गल दंभ है
सत्य यह है निराशा से ही मुक्ति पथ मिले
सृष्टि -सृष्टा के अवर्णित रूप की आहट मिले

इसलिये ही ओ निराशा ,आज मै  करता तेरी जय
आ निराशा घेर मुझको ,भेद दे मेरा ह्रदय ............//